अमृता और इमरोज़: एक छत, दो रूहें और एक 'बेनाम' रिश्ता

Piyush Mishra
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अमृता और इमरोज़: एक छत, दो रूहें और एक 'बेनाम' रिश्ता

(वह प्रेम कहानी जिसने समाज की शर्तों को नकार दिया)


प्रेम को अक्सर 'नाम' की बैसाखी चाहिए होती है—कभी शादी, कभी मंगनी, तो कभी कोई सामाजिक मुहर। हम जिस समाज में रहते हैं, वहां रिश्तों की वैधता 'कागजों' से तय होती है, 'एहसासों' से नहीं। लेकिन इतिहास में कुछ किरदार ऐसे भी हुए जिन्होंने प्रेम को रिश्तों के पिंजरे में कैद करने के बजाय उसे खुला आसमान दिया। अमृता प्रीतम और इमरोज़ की कहानी भी कुछ ऐसी ही है।

यह कहानी सिर्फ दो प्रेमियों की नहीं है, यह एक 'विद्रोह' की कहानी है। एक ऐसा मौन विद्रोह, जिसने बिना किसी नारे और शोर-शराबे के भारतीय समाज की रूढ़ियों को तोड़ दिया। आज जब हमारी नई पीढ़ी 'Live-in Relationship' (लिव-इन) पर बहस कर रही है, सही और गलत के तराजू में रिश्तों को तौल रही है, तब हमें दशकों पीछे मुड़कर देखना चाहिए।

अमृता और इमरोज़: जिनके बीच शब्दों से ज्यादा खामोशी बोलती थी

1. साहिर: वह धुआँ, जिसे अमृता ने ताउम्र पिया

अमृता और इमरोज़ के सुकून भरे रिश्ते को समझने से पहले, उस 'तूफान' को समझना ज़रूरी है जिसने अमृता की रूह को झकझोर कर रख दिया था। वह नाम था—साहिर लुधियानवी

अमृता का साहिर से इश्क एकतरफा, खामोश और दर्द भरा था। यह वह दौर था जब अमृता लाहौर और दिल्ली के बीच अपनी पहचान तलाश रही थीं। साहिर से उनकी मुलाकातें अक्सर खामोश होती थीं। दोनों एक कमरे में घंटों बैठे रहते, बिना एक शब्द बोले। साहिर लगातार सिगरेट पीते रहते, और अमृता उस धुएं में साहिर का चेहरा तलाशती रहतीं।

अमृता और साहिर: एक ऐसी प्रेम कहानी जो कभी पूरी न हो सकी

साहिर के जाने के बाद, अमृता उनकी एश-ट्रे में बची हुई अधजली सिगरेट (Cigarette Stubs) को उठाकर पीती थीं। उन्हें लगता था कि इस तरह वे साहिर की उंगलियों को छू रही हैं। यह नशा निकोटीन का नहीं, बल्कि इश्क का था। लेकिन साहिर हवा के झोंके थे, जो कभी किसी एक खिड़की पर नहीं रुके। वे चले गए, अमृता को तन्हा छोड़कर।

"मैंने जब भी चाहा कि तेरे तसव्वुर के सिवा,
कोई और अक्स मेरी आँखों में ना उभरे...
पर तू, जो कहीं भी नहीं था,
हर जगह मौज़ूद रहा..."

2. इमरोज़: वह छत, जिसने कभी शर्तें नहीं रखीं

साहिर अगर 'दर्द' थे, तो इमरोज़ 'मरहम' बनकर आए। इमरोज़ (जिनका असली नाम इंद्रजीत था) अमृता से उम्र में छोटे थे, लेकिन समझ और ठहराव में कहीं अधिक गहरे।

इमरोज़ और अमृता की मुलाकात एक संयोग थी, लेकिन साथ एक नियति। इमरोज़ जानते थे कि अमृता के दिल के सबसे खास कोने में साहिर आज भी बसते हैं। एक सामान्य पुरुष शायद ईर्ष्या से जल जाता, या अमृता को बदलने की कोशिश करता। शायद वह कहता कि "मेरे लिए तुम्हें साहिर को भूलना होगा।" लेकिन इमरोज़? इमरोज़ तो प्रेम की उस ऊंचाई पर थे जहाँ ईर्ष्या की कोई जगह ही नहीं थी।

इमरोज़ का प्रेम: जिसने अमृता को बदला नहीं, बस थाम लिया

स्कूटर और पीठ पर लिखा नाम

इस प्रेम कहानी का सबसे खूबसूरत किस्सा वह है जब अमृता, इमरोज़ के स्कूटर के पीछे बैठकर कहीं जाती थीं। हवा के थपेड़ों के बीच, अमृता इमरोज़ की पीठ पर अपनी उंगलियों से 'साहिर' का नाम लिखती रहती थीं।

इमरोज़ को यह पता था। लेकिन उन्होंने कभी स्कूटर नहीं रोका, कभी शिकायत नहीं की। सालों बाद जब किसी ने इमरोज़ से पूछा कि आपको बुरा नहीं लगता था? तो इमरोज़ ने जो जवाब दिया, वह प्रेम की सबसे बड़ी परिभाषा है:

"मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है कि वह मेरी पीठ पर किसका नाम लिख रही है? जब तक नाम लिखने वाली उंगलियां अमृता की हैं, मुझे सब कुबूल है।"

3. शादी नहीं, 'साहचर्य' (Companionship)

अमृता और इमरोज़ ने 40 साल से भी अधिक समय एक छत के नीचे बिताया—बिना शादी किए। आज जिसे हम 'लिव-इन' (Live-in) कहते हैं, अमृता और इमरोज़ के लिए वह एक पवित्र 'साहचर्य' था।

वे दुनिया को यह साबित नहीं करना चाहते थे कि वे बागी हैं। उन्होंने बस अपनी सुविधा और सुकून को चुना। दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए। इमरोज़ पेंटर थे, अमृता लेखिका। अमृता 'नागमणि' पत्रिका निकालती थीं, और इमरोज़ उसके कवर डिजाइन करते थे।

क्या यह आज के दौर के लिए सबक नहीं है?
आज रिश्ते छोटी-छोटी बातों पर टूटते हैं क्योंकि हम एक-दूसरे को 'बदलना' चाहते हैं। हम 'स्पेस' मांगते हैं लेकिन दे नहीं पाते। इमरोज़ ने सिखाया कि प्रेम का मतलब 'थामना' है, 'बांधना' नहीं। उन्होंने अमृता को वह आकाश दिया जहाँ वह खुलकर उड़ सकें, अपनी कविताएं लिख सकें, यहाँ तक कि अपने पुराने प्रेमी को याद भी कर सकें।

4. "मैं तुम्हें फिर मिलूँगी..." (अंतिम विदाई)

जीवन के अंतिम पड़ाव में, जब अमृता बीमार थीं और उनका शरीर कमजोर पड़ रहा था, तब भी इमरोज़ उनके इर्द-गिर्द एक साये की तरह घूमते रहे। वे उनका ख्याल रखते, उन्हें समय देते।

अंतिम समय में लिखी गई वह कविता जो अमर हो गई

अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले अमृता ने इमरोज़ के लिए वह कालजयी कविता लिखी, जो आज भी हिंदी और पंजाबी साहित्य की सबसे भावुक कविता मानी जाती है। यह कविता इस बात का प्रमाण थी कि अंत में, इमरोज़ का निस्वार्थ प्रेम जीत गया था:

"मैं तुम्हें फिर मिलूँगी
कहाँ? किस तरह? नहीं जानती
शायद तुम्हारे तख़्ईल की चिंगारी बन कर
तुम्हारी कैनवस पर उतरूँगी
या शायद तुम्हारी कैनवस के ऊपर
एक रहस्यमय रेखा बन कर
ख़ामोश तुम्हें देखती रहूँगी"

5. अमृता के बाद इमरोज़ का क्या हुआ?

2005 में अमृता इस दुनिया को अलविदा कह गईं। लोगों को लगा कि इमरोज़ टूट जाएंगे। लेकिन इमरोज़ ने शोक नहीं मनाया। जब उनसे पूछा गया कि उन्हें कैसा लग रहा है, तो उन्होंने कहा:

"अमृता गई कहाँ है? वह तो यही है। अगर वह चली जाती तो मैं रोता। वह तो मेरे जिस्म में, मेरी रूह में घुल गई है।"

अमृता के जाने के बाद भी इमरोज़ सालों तक जीवित रहे, लेकिन अकेले नहीं। वे कहते थे कि अमृता अब भी उनके साथ चाय पीती हैं। यह पागलपन नहीं, यह इश्क़ की वह 'रूहानी' अवस्था (Spiritual State) थी जिसे समझना आम दुनिया के बस की बात नहीं।

निष्कर्ष: एक रूहानी विरासत

अमृता और इमरोज़ की कहानी हमें बताती है कि रिश्ते 'मैरिज सर्टिफिकेट' या समाज की स्वीकृति के मोहताज नहीं होते। रिश्ता वह है जहाँ दो लोग एक-दूसरे को बढ़ने का मौका दें, जहाँ खामोशी समझी जाए और जहाँ अतीत को कुरेदने के बजाय वर्तमान को खूबसूरती से जिया जाए।

इस देश में 'जाति', 'धर्म' और 'उम्र' से भी ऊपर एक चीज़ है—और वह है दो रूहों का मिलन। अमृता ने साबित किया कि एक औरत अपनी शर्तों पर जी सकती है, और इमरोज़ ने साबित किया कि एक मर्द अपनी प्रेमिका को बिना कैद किए भी उससे बेपनाह मोहब्बत कर सकता है।

क्या आपको भी लगता है कि आज के रिश्तों में इस तरह के 'ठहराव' की कमी है? अपने विचार कमेंट्स में जरूर बताएं।

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3 Comments

  1. ठहराव और स्पेस रिश्तों को मज़बूत बनाते है, जो आज के समय में भी उतना ही सत्य है ✨...... बहुत ही भावनात्मक प्रदर्शन 👏👌

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