दिनकर की 'रश्मिरथी' : एक समीक्षा

Scribble Hindi
0

  

रश्मिरथी समीक्षा ,Rasmirathi book review

दिनकर की 'रश्मिरथी' : एक समीक्षा

हिंदी साहित्य के इतिहास में रामधारी सिंह 'दिनकर' का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। जब भी वीर रस की बात होती है, जब भी ओजस्वी कविता की चर्चा छिड़ती है, तो दिनकर का नाम सबसे पहले जुबान पर आता है। 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव में जन्मे दिनकर ने अपनी लेखनी से राष्ट्रीय चेतना को नई ऊंचाई प्रदान की। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से इतिहास, राजनीति विज्ञान और दर्शन का अध्ययन किया, जिसने उनकी वैचारिक दृष्टि को व्यापक बनाया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होंने अपनी कविताओं से अंग्रेज सरकार के विरुद्ध आवाज बुलंद की, और इसलिए वे 'अमिताभ' छद्म नाम से भी लिखते थे। आजादी के बाद वे 'राष्ट्रकवि' के सम्मान से विभूषित हुए। भूषण के बाद उन्हें वीर रस का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जाता है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्म भूषण और ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसे अनेक सम्मानों से नवाजा गया। उनकी रचनाओं में 'रश्मिरथी', 'कुरुक्षेत्र', 'परशुराम की प्रतीक्षा', 'उर्वशी' और 'संस्कृति के चार अध्याय' प्रमुख हैं।​

दिनकर की रचनाओं में 'रश्मिरथी' एक ऐसी कृति है जो न केवल हिंदी साहित्य में बल्कि भारतीय संस्कृति में भी अपना विशिष्ट स्थान रखती है। 1952 में प्रकाशित यह खंडकाव्य महाभारत के सबसे जटिल और मार्मिक चरित्र 'कर्ण' की कहानी को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। 'रश्मिरथी' का शाब्दिक अर्थ है 'सूर्य की किरणों का सारथी  —और यह नाम कर्ण को पूरी तरह परिभाषित करता है, जो सूर्यदेव के पुत्र थे।


रश्मिरथी का कथानक: कर्ण की त्रासद गाथा

रश्मिरथी सात सर्गों में विभाजित एक प्रबंध काव्य है जो कर्ण के जीवन को उनके जन्म से लेकर कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में उनकी वीरगति तक प्रस्तुत करता है। कर्ण कुंती के प्रथम पुत्र थे, जिन्होंने उन्हें  अविवाहित अवस्था में सूर्य देव से वरदान स्वरूप प्राप्त किया था। समाज के भय से कुंती ने नवजात कर्ण को गंगा नदी में एक टोकरी में बहा दिया। सूत वंश के राधा और अधिरथ ने उसे पाला, और इसी कारण वह जीवनभर 'सूतपुत्र' कहलाकर अपमानित होता रहा।​

कर्ण असाधारण प्रतिभा और साहस के धनी थे, परंतु समाज ने उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया। दिनकर ने पहले सर्ग में उस दृश्य का मार्मिक चित्रण किया है जब द्रौपदी के स्वयंवर में कर्ण का अपमान होता है और उन्हें 'सूतपुत्र' कहकर धनुष उठाने से रोक दिया जाता है। यह पंक्तियां आज भी पाठकों के रोंगटे खड़े कर देती हैं: “धँस जाये वह देश अतल में, गुण की जहाँ नहीं पहचान, जाति-गोत्र के बल से ही आदर पाते हैं जहाँ सुजान।”​

कर्ण का चरित्र दिनकर ने एक त्रासद नायक (tragic hero) के रूप में प्रस्तुत किया है। वे दुर्योधन के प्रति अटूट निष्ठा रखते हैं क्योंकि दुर्योधन ने उन्हें सम्मान दिया, अंग देश का राजा बनाया और मित्रता का हाथ बढ़ाया। दिनकर के शब्दों में: “कुन्ती ने केवल जन्म दिया, राधा ने माँ का कर्म किया, पर, कहते जिसे असल जीवन, देने आया वह दुर्योधन।”​


दिनकर की लेखन शैली: वीर रस, करुण रस और दार्शनिकता का अद्भुत मिश्रण

दिनकर की लेखन शैली 'रश्मिरथी' में अपने चरम पर दिखाई देती है। वीर रस, जो उनकी पहचान रहा है, इस काव्य में पूरी शक्ति के साथ प्रस्फुटित होता है। परंतु साथ ही करुण रस का इतना मार्मिक प्रयोग है कि पाठक का हृदय पिघल जाता है। कर्ण के अपमान, उनकी व्यथा, कुंती की पीड़ा—ये सब करुण रस की पराकाष्ठा हैं।

दिनकर की भाषा सरल होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली है। उनके छंद, लय और शब्द-चयन में एक अद्भुत संगीतात्मकता है। वे ऐसे शब्द-चित्र खींचते हैं कि दृश्य आंखों के सामने साकार हो उठता है। इसके साथ ही, दिनकर ने गहन दार्शनिक प्रश्न भी उठाए हैं—नियति और कर्म, समाज और व्यक्ति, धर्म और न्याय, मित्रता और कर्तव्य—ये सभी विषय रश्मिरथी में गूंजते हैं।​

यह कविता महज मनोरंजन के लिए नहीं है; यह पाठक को सोचने पर मजबूर करती है। कर्ण के माध्यम से दिनकर ने जीवन के उन गहरे प्रश्नों को उठाया है जो हर युग में प्रासंगिक रहते हैं।​


प्रमुख सर्ग

रश्मिरथी के सात सर्गों में कर्ण के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को प्रस्तुत किया गया है। पहला सर्ग कर्ण के जन्म, उनके त्याग और प्रारंभिक संघर्ष को दर्शाता है। द्वितीय सर्ग में परशुराम से शिक्षा और उनके शाप की कथा है जो कर्ण के भाग्य को सदा के लिए बदल देती है।​

तृतीय सर्ग में कृष्ण का दुर्योधन को समझाना और फिर कर्ण से मिलना—यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। कृष्ण कर्ण को उनकी असली पहचान बताते हैं और पांडवों के साथ आने का निमंत्रण देते हैं, परंतु कर्ण अपनी मित्रता को धोखा देने से इंकार कर देते हैं। यहां दिनकर की ये पंक्तियां प्रसिद्ध हैं: “वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर।”


चतुर्थ सर्ग रश्मिरथी का सबसे मार्मिक और शक्तिशाली भाग है। इसमें इंद्र देव ब्राह्मण का वेश धारण कर कर्ण से उनका कवच-कुंडल मांगते हैं। कर्ण को ज्ञात हो जाता है कि यह छल है, फिर भी वे अपनी दानवीरता के कारण अपने प्राण रक्षक कवच-कुंडल दान कर देते हैं। यह संवाद अत्यंत तीव्र और नाटकीय है: "तू दानी, मैं कुटिल प्रवंचक, तू पवित्र, मैं पापी, तू देकर भी सुखी और मैं लेकर भी परितापी।


कर्ण इंद्र से कहते हैं: "कवच और कुंडल ले करके प्राण छोड़ते हैं क्यों? यह शायद, इसलिए कि अर्जुन जिए, आप सुख लूटे।" फिर भी वे कहते हैं: “अतः आपने जो माँगा है दान वही मैं दूँगा, शिवि-दधिचि की पंक्ति छोड़कर जग में अयश न लूँगा।”​


पांचवें सर्ग में कुंती का कर्ण से मिलना और उन्हें अपने पुत्र के रूप में स्वीकार करने की गुहार है। परंतु कर्ण कहते हैं: "हे कृष्ण आप चुप ही रहिये, इस पर न अधिक कुछ भी कहिये, सुनना न चाहते तनिक श्रवण, जिस माँ ने मेरा किया जनन।" वे कुंती को वह माँ नहीं मानते जिसने उन्हें जन्म के तुरंत बाद त्याग दिया।​


छठे सर्ग में कर्ण का सेनापति के रूप में युद्ध करना और घटोत्कच का वध दिखाया गया है। सातवें और अंतिम सर्ग में कर्ण और अर्जुन के बीच अंतिम युद्ध है, जो इतना भव्य है कि दोनों सेनाएं अपना युद्ध रोककर इस महासमर को देखती हैं। अंततः शापों और षड्यंत्रों के कारण कर्ण की मृत्यु होती है, परंतु उनकी वीरता और दानवीरता अमर हो जाती है।​


यादगार पंक्तियां: दिनकर की काव्य-शक्ति का प्रमाण

रश्मिरथी की कुछ पंक्तियां इतनी शक्तिशाली हैं कि वे हिंदी साहित्य के स्वर्णिम खजाने का हिस्सा बन गई हैं। सबसे प्रसिद्ध पंक्ति है: "जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है"। यह पंक्ति मानव स्वभाव की गहरी समझ को दर्शाती है—जब व्यक्ति का पतन निकट होता है, तो उसकी समझ और विवेक सबसे पहले नष्ट हो जाते हैं।

कृष्ण के विराट रूप को दिखाते हुए दिनकर लिखते हैं: "यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल।" ये पंक्तियां अद्भुत दार्शनिक गहराई लिए हुए हैं।​

कर्ण की वीरता पर: "मही का सूर्य होना चाहता हूं, विभा का तूर होना चाहता हूं, समय को चाहता हूं दास करना, अभय हो मृत्यु का उपहास करना।" ये पंक्तियां कर्ण के अदम्य साहस को प्रकट करती हैं।

वीरता की परिभाषा पर: "सच है, विपत्ति जब आती है, कायर को ही दहलाती है, सूरमा नहीं विचलित होते, क्षण एक नहीं धीरज खोते।" यह कविता आज भी प्रेरणा का स्रोत है।

मित्रता पर: "मित्रता बड़ा अनमोल रतन, कब उसे तोल सकता है धन, जीवन का मूल समझता हूं धन को मैं, धूल समझता हूं।" कर्ण की मित्रता के प्रति निष्ठा इन पंक्तियों में झलकती है।​


विवाद और बहसें

रश्मिरथी को लेकर साहित्यिक जगत में अनेक बहसें हुई हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि दिनकर ने कर्ण को अर्जुन से अधिक महिमामंडित क्यों किया? परंपरागत महाभारत में कर्ण को नकारात्मक चरित्र के रूप में देखा जाता है—वे दुर्योधन का साथ देते हैं, द्रौपदी का अपमान करते हैं, और अनेक अनैतिक कृत्यों में शामिल होते हैं। परंतु दिनकर ने कर्ण को एक दलित नायक (subaltern hero) के रूप में प्रस्तुत किया।​

1950 के दशक के भारत में दलित मुक्ति और सामाजिक समानता की भावना बलवती थी। दिनकर ने कर्ण के माध्यम से जाति-आधारित भेदभाव और सामाजिक अन्याय पर प्रहार किया। कर्ण की कहानी दरअसल उन सभी लोगों की कहानी है जो प्रतिभाशाली होते हुए भी जन्म के आधार पर अपमानित किए जाते हैं। दिनकर ने जन्म के बजाय योग्यता और चरित्र को महत्व दिया—यह उस समय के लिए एक क्रांतिकारी विचार था।​

कुछ आलोचकों का मानना है कि दिनकर ने कर्ण की कमियों को नजरअंदाज कर दिया। परंतु दिनकर का उद्देश्य कर्ण को एक सामाजिक-राजनीतिक प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना था। रश्मिरथी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस पूरे वर्ग की कहानी है जो सामाजिक व्यवस्था के कारण अपने अधिकारों से वंचित रहा है।​

दिनकर की यह व्याख्या युद्ध की निरर्थकता, उपभोक्तावाद की बुराई, और जाति व्यवस्था के अन्याय जैसे महत्वपूर्ण संदेश देती है। यही कारण है कि रश्मिरथी को न केवल साहित्यिक बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।​


प्रकाशन और सांस्कृतिक प्रभाव

रश्मिरथी का प्रकाशन 1952 में हुआ था—भारत की स्वतंत्रता के मात्र पांच वर्ष बाद। यह वह समय था जब देश नए सामाजिक और राजनीतिक मूल्यों की तलाश में था। रश्मिरथी ने उस समय की आवश्यकताओं को पूरा किया—यह एक ऐसा काव्य बना जिसने परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का काम किया।​

रश्मिरथी का सांस्कृतिक प्रभाव अपार है। यह हिंदी साहित्य की सर्वश्रेष्ठ आधुनिक महाकाव्य रचनाओं में से एक मानी जाती है। इसकी पंक्तियां आज भी लोकप्रिय हैं और अनेक अवसरों पर उद्धृत की जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रश्मिरथी के अंग्रेजी अनुवाद की प्रशंसा की है। अनुराग कश्यप की फिल्म 'गुलाल' (2009) में पीयूष मिश्रा ने रश्मिरथी की पंक्तियों को गाया है। अभिनेता मनोज बाजपेयी ने स्वीकार किया है कि संघर्ष के दिनों में रश्मिरथी उनका सबसे बड़ा सहारा था।​

रश्मिरथी का मंचन भी कई बार हुआ है। डॉ. शकुंतला शुक्ला और व्योमेश शुक्ला ने रूपवाणी, वाराणसी के बैनर तले इसका मंचन किया है, जो 47 बार से अधिक प्रस्तुत किया जा चुका है। 2008 में दिनकर की जन्मशती पर भारत के प्रधानमंत्री ने संसद के केंद्रीय कक्ष में उनका चित्र अनावृत किया। 2012 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 21 प्रमुख लेखकों और समाजसेवकों को 'राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर साहित्य रत्न सम्मान' प्रदान किया।​



आज भी प्रासंगिक क्यों है रश्मिरथी?

रश्मिरथी की सबसे बड़ी ताकत इसकी कालजयी प्रासंगिकता है। आज भी भारत में जाति-आधारित भेदभाव, सामाजिक अन्याय और योग्यता की अनदेखी जैसी समस्याएं विद्यमान हैं। कर्ण का संघर्ष आज के युग के उन करोड़ों लोगों का संघर्ष है जो प्रतिभा होते हुए भी सामाजिक पूर्वाग्रहों के शिकार हैं।​

दिनकर की कविता में नियति और कर्म का जो संघर्ष दिखाया गया है, वह हर युग में प्रासंगिक है। क्या मनुष्य अपनी नियति को बदल सकता है? क्या कर्म से भाग्य पर विजय पाई जा सकती है? ये प्रश्न आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।​

रश्मिरथी में मित्रता, निष्ठा और त्याग के जो मूल्य प्रस्तुत किए गए हैं, वे आज की भौतिकवादी दुनिया में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। कर्ण का चरित्र हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए।​

रश्मिरथी की काव्य-शैली आज के पाठकों को भी प्रभावित करती है। दिनकर की भाषा सरल है, परंतु उसमें गहराई है। स्कूल, कॉलेज और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए यह एक आदर्श रचना है। यह न केवल भाषा और साहित्य की समझ बढ़ाती है, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण सवालों पर विचार करने के लिए प्रेरित भी करती है।​


दिनकर की काव्य-प्रतिभा और रश्मिरथी से सीख

रामधारी सिंह दिनकर केवल कवि नहीं थे—वे एक विचारक, दार्शनिक और राष्ट्रवादी थे। उनकी रचना 'रश्मिरथी' हिंदी साहित्य का एक अनमोल रत्न है जो पीढ़ी दर पीढ़ी पाठकों को प्रेरित करता रहेगा। कर्ण के माध्यम से दिनकर ने जो संदेश दिया है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है—योग्यता को सम्मान मिलना चाहिए, जन्म के आधार पर भेदभाव अनुचित है, और सच्ची मित्रता अमूल्य है।​

रश्मिरथी एक ऐसा काव्य है जो हमें यह सिखाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी विपत्तियां क्यों न आएं, हमें अपने आत्मसम्मान और सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए। कर्ण का चरित्र हमें बताता है कि असली वीरता केवल युद्ध में नहीं, बल्कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में अपनी मानवीयता और मूल्यों को बचाए रखने में है।​

दिनकर ने अपनी लेखनी से कर्ण को अमरता प्रदान की। आज जब हम रश्मिरथी पढ़ते हैं, तो हमें एहसास होता है कि यह महज एक कविता नहीं है—यह जीवन का एक दर्शन है, एक मार्गदर्शक है। यह पंक्तियाँ आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं और हृदय को झकझोर देती हैं। दिनकर की काव्य-प्रतिभा को नमन करते हुए कहा जा सकता है कि रश्मिरथी हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है, जिसे हर भारतीय को अवश्य पढ़ना चाहिए।


रश्मिरथी पढ़ने के लिए नीचे दिए हुए लिंक से  आज ही आर्डर करें :

Post a Comment

0 Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!