निराला: वो पिता जिसने बेटी की 'अर्थी' कंधों पर नहीं, 'कलम' से उठाई

Piyush Mishra
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निराला: वो पिता जिसने बेटी की 'अर्थी' कंधों पर नहीं, 'कलम' से उठाई

"जब दुनिया उन्हें 'महाप्राण' कह रही थी, तब वे खुद को एक 'निरर्थक पिता' मान रहे थे।"


सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला': जिनकी आँखों में आग थी और हृदय में करुणा का सागर।

इतिहास गवाह है कि महान कला अक्सर महान पीड़ा से जन्म लेती है। लेकिन हिंदी साहित्य में एक पीड़ा ऐसी थी, जिसने पत्थर को भी पिघला दिया। यह पीड़ा किसी प्रेमी की नहीं, बल्कि एक 'पिता' की थी।

हम सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' को उनके ओज, उनके विद्रोह और उनकी फक्कड़मस्ती के लिए जानते हैं। वे वो थे जिन्होंने 'जूही की कली' जैसी कविता लिखकर संपादकों के मुंह पर तमाचा मारा था जब उन्होंने इसे 'अश्लील' कहकर छापने से मना कर दिया था। उनका व्यक्तित्व हिमालय जैसा अटल था। लेकिन उस भारी-भरकम, पहलवान जैसे शरीर के अंदर एक ऐसा पिता सिसक रहा था, जिसके पास अपनी इकलौती बेटी के इलाज के लिए भी पैसे नहीं थे।

1. एक बागी पिता: "मैंने रीतियां तोड़ दीं"

निराला का जीवन संघर्षों का दूसरा नाम था। महज 22 साल की उम्र में उनकी पत्नी (मनोहरा देवी) का साथ छूट गया। यह वो दौर था जब स्पेनिश फ्लू (महामारी) ने देश को तबाह कर रखा था। निराला के परिवार के कई सदस्य इसमें चल बसे। इन सबके बीच बची थी तो सिर्फ एक नन्ही जान—सरोज

निराला एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार से थे, लेकिन उनके विचार समय से बहुत आगे थे। उन्होंने अपनी बेटी को 'बोझ' नहीं समझा, बल्कि उसे अपना 'अभिमान' माना। उस दौर में जब बेटियों को पर्दे में रखा जाता था, निराला ने सरोज को शिक्षित करने का सपना देखा। लेकिन समाज और गरीबी की दोहरी मार ने उनके सपनों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

2. जब पिता को निभानी पड़ी 'माँ' की भूमिका

पत्नी के जाने के बाद, सरोज के लिए निराला ही माता थे और निराला ही पिता। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि वे सरोज को अपने पास रख पाने में असमर्थ थे। मजबूरन, सरोज का पालन-पोषण उसके ननिहाल (नाना-नानी के घर) में हुआ।

निराला के मन में यह टीस हमेशा रही कि वे अपनी बेटी को वो लाड़-प्यार नहीं दे सके जिसकी वह हकदार थी। वे अपनी कविताओं में लिखते हैं:

"ननिहाल तेरा रहा अपना,
वहीं हुआ पालन-पोषण...
भरा वहीं पर तूने बचपन!" — (स्रोत: सरोज स्मृति)

यह पंक्तियाँ एक पिता की मजबूरी बयां करती हैं। वे चाहते थे कि उनकी बेटी उनकी गोद में खेले, लेकिन गरीबी ने बाप-बेटी के बीच एक दीवार खड़ी कर दी थी।

3. विवाह का सन्नाटा: शगुन या अपशगुन?

जब सरोज विवाह योग्य हुई, तो निराला ने एक और क्रांतिकारी कदम उठाया। उन्होंने दहेज प्रथा को ठुकरा दिया। सरोज का विवाह हुआ, लेकिन यह विवाह किसी सामान्य भारतीय विवाह जैसा नहीं था।

न कोई बैंड-बाजा, न मेहमानों का शोर, न रिश्तेदारों की भीड़। निराला ने स्वयं ही पुरोहित का काम किया। लेकिन उस विवाह मंडप में निराला को खुशी नहीं, बल्कि एक अजीब सा भय सता रहा था। जब उन्होंने दुल्हन के लिबास में सजी सरोज को देखा, तो उन्हें अपनी स्वर्गीय पत्नी मनोहरा देवी की छवि दिखाई दी।

"शृंगार, रहा जो निराकार
रस कविता में उच्छ्वसित-धार
गाया स्वर्गीय-प्रिया-संग
भरता प्राणों में राग-रंग..." — सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

निराला को लगा जैसे सरोज के रूप में उनकी पत्नी फिर से उनके सामने खड़ी है, लेकिन यह मिलन भी 'मृत्यु' का संकेत दे रहा था। वे उस समय 'शकुन' और 'अपशकुन' के द्वंद्व में फंसे हुए थे। एक पिता का दिल अनहोनी की आशंका से कांप रहा था।

4. 19 साल की उम्र और मौत की दस्तक

विवाह के कुछ ही समय बाद, नियति ने अपना क्रूर खेल खेला। सरोज बीमार पड़ी। यह बीमारी शायद शारीरिक कम और मानसिक ज्यादा थी—अभावों की बीमारी। एक "भाग्यहीन पिता" के पास इलाज के साधन नहीं थे।

वह फूल जो अभी खिला भी नहीं था, मुरझा गया। महज 18-19 साल की उम्र में सरोज की मृत्यु हो गई। सरोज अपने ननिहाल में ही अंतिम सांसें लेती है। निराला खबर सुनते हैं और पत्थर हो जाते हैं। एक पिता के लिए इससे बड़ी सजा क्या होगी कि वह अपनी बेटी को बचा न सके? उसकी डोली उठी ही थी कि अब अर्थी उठने की बारी आ गई।

 "दुःख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज जो नहीं कही!

5. "धन्य! मैं पिता निरर्थक था..."

सरोज के जाने के बाद निराला टूट गए। उनका दर्द आंसुओं से नहीं, शब्दों से फूटा। 1935 में उन्होंने 'सरोज स्मृति' लिखी। यह कविता हिंदी साहित्य का पहला ऐसा दस्तावेज़ है जहाँ एक पिता अपनी हार स्वीकार करता है।

आमतौर पर आत्मकथाओं में लोग अपनी उपलब्धियां गिनाते हैं, लेकिन 'महाप्राण' निराला ने इसमें अपनी 'कमियां' गिनाईं। उन्होंने लिखा:

"धन्य! मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
जाना तो अर्थागमोपाय,
पर रहा सदा संकुचित-काय..."

इन पंक्तियों का अर्थ रूह कपाने वाला है: "मैं धन्य हूँ, पर एक बेकार पिता हूँ। मैं जानता था कि धन कैसे कमाया जाता है (चाटुकारिता करके), लेकिन मैंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, इसलिए गरीब रह गया और तेरे लिए कुछ न कर सका।"

6. अर्थी नहीं, 'कर्मों' का तर्पण

लेख का शीर्षक कहता है कि उन्होंने बेटी की अर्थी 'कलम' से उठाई। इसका प्रमाण कविता की आखिरी पंक्तियों में मिलता है।

हिन्दू धर्म में पिता पुत्री का तर्पण (श्राद्ध) नहीं करता, और न ही निराला के पास ब्राह्मणों को देने के लिए दान-दक्षिणा थी। तो उन्होंने एक अनोखा रास्ता चुना। उन्होंने अपने जीवन भर की सबसे कीमती कमाई—अपने 'सत्कर्म' (Good Deeds)—अपनी बेटी को सौंप दिए।

"मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल...
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर करता मैं तेरा तर्पण!" — सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

आज 80 साल बाद भी हम सरोज को याद कर रहे हैं, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि एक पिता ने अपनी कलम से उसका 'तर्पण' किया था। 'सरोज स्मृति' केवल एक कविता नहीं है, यह हर उस पिता की आवाज़ है जो अपनी संतान के लिए दुनिया से लड़ता है, हारता है, लेकिन प्यार करना नहीं छोड़ता।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: 'सरोज स्मृति' को हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ शोक-गीत क्यों कहा जाता है?
क्योंकि यह केवल किसी की मृत्यु पर लिखा गया गीत नहीं है, बल्कि यह एक पिता का 'स्वीकारोक्ति-पत्र' (Confession) है। इसमें निराला अपनी गरीबी, बेबसी और पिता के रूप में अपनी असफलता को बिना किसी लाग-लपेट के स्वीकार करते हैं, जो इसे अत्यंत मार्मिक और अद्वितीय बनाता है।
Q2: निराला ने खुद को 'भाग्यहीन पिता' क्यों कहा?
निराला ने जीवन भर अपनों को खोया। पहले माँ, फिर पत्नी और अंत में जवान बेटी सरोज। गरीबी के कारण वे अपनी बेटी का उचित इलाज नहीं करवा पाए और न ही उसे सुख दे सके। इसी आत्मग्लानि (Guilt) में उन्होंने खुद को 'भाग्यहीन' कहा।
Q3: सरोज स्मृति कब लिखी गई थी?
यह कविता सरोज की मृत्यु के लगभग दो साल बाद, 1935 ई. में लिखी गई थी। यह निराला के काव्य संग्रह 'अनामिका' में संकलित है।
Q4: निराला ने बेटी का तर्पण कैसे किया?
निराला के पास कर्मकांड के लिए धन नहीं था और वे रूढ़ियों के विरोधी थे। इसलिए उन्होंने कविता के अंत में अपने जीवन भर के संचित 'सत्कर्मों' (Good Deeds) को अपनी बेटी को समर्पित करके उसका तर्पण किया।

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