गालियाँ: भाषा का 'कूड़ा' या हमारे गुस्से का 'सेफ्टी वाल्व'?

Piyush Mishra
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कल्पना कीजिये: आप सुबह-सुबह नंगे पैर चल रहे हैं और अचानक आपके पैर की छोटी उंगली (Pinky toe) लोहे की मेज़ के पाये से टकरा जाए।

उस परम वेदना के क्षण में आपके मुख से क्या निकलेगा? "हे ईश्वर! यह क्या अनर्थ हो गया?" या फिर "उफ्फ! मुझे बहुत कष्ट हो रहा है?"

जी नहीं। उस वक़्त आपके मुंह से जो निकलेगा, उसे सभ्य समाज की डिक्शनरी में 'गाली' कहते हैं और भौतिक विज्ञान की भाषा में 'ऊर्जा का संरक्षण' (Conservation of Energy) कहते हैं।

"हम भारतीय चाहे धर्म, राजनीति और खाने पर कितना भी लड़ लें, लेकिन सड़क पर जब कोई हमारी गाड़ी को गलत तरीके से ओवरटेक करता है, तो हम सब एक ही भाषा बोलते हैं। वह भाषा, जिसका व्याकरण किसी स्कूल में नहीं, बल्कि 'नुक्कड़' पर सिखाया जाता है।"

आज इस 'अभिव्यक्ति' लेख में हम अपनी नैतिकता का चश्मा उतारकर भाषा के उस 'डार्क वेब' का विश्लेषण करेंगे जिसे हम गालियाँ कहते हैं। क्या ये वाकई भाषा का कचरा हैं, या हमारे मानसिक संतुलन को बनाए रखने वाला 'सेफ्टी वाल्व'?

1. गालियाँ: गरीब आदमी की 'थेरेपी' (The Poor Man's Therapy)

मनोविज्ञान कहता है कि इंसान के अंदर कुंठा (Frustration) का एक प्रेशर कुकर होता है। अमीर आदमी इस कुकर की सीटी बजाने के लिए 'थेरेपिस्ट' के पास जाता है, हज़ारों रुपये खर्च करता है।

लेकिन भारत का आम आदमी क्या करे? उसके पास थेरेपिस्ट नहीं है, उसके पास 'गालियाँ' हैं।

जब बॉस बिना बात के डांटता है, या जब बिजली विभाग वाले बिना बताए लाइट काट देते हैं, तो एक अदद "सा..... (Fill in the blank)" बोलकर जो कलेजे को ठंडक मिलती है, वो किसी एयर कंडीशनर में नहीं है। वैज्ञानिक रूप से इसे 'Lalochezia' कहते हैं—यानी अभद्र भाषा का प्रयोग करके दर्द कम करना।

2. व्याकरण का चमत्कार: 'आलू' जैसा शब्द

हिंदी गालियों की भाषाई संरचना (Linguistic Structure) पर कभी गौर कीजिये। ये दुनिया की सबसे 'लचीली' (Flexible) शब्दावली है।

एक ही शब्द (जो अक्सर 'च' या 'भ' से शुरू होता है) का प्रयोग देखिये:

  • संज्ञा (Noun) के रूप में: "वो आदमी बहुत बड़ा [गाली] है।" (चरित्र बता दिया)
  • विशेषण (Adjective) के रूप में: "क्या [गाली] काम किया है यार!" (तारीफ कर दी)
  • क्रिया (Verb) के रूप में: "उसने मेरा प्लान [गाली] कर दिया।" (काम बिगड़ना)
  • विराम चिह्न (Comma) के रूप में: "अरे भाई [गाली], तुम कब आए?" (यहाँ इसका कोई अर्थ नहीं, बस वाक्य में वज़न डालने के लिए है।)

गालियाँ हमारी भाषा का 'आलू' हैं, जो किसी भी सब्जी (वाक्य) के साथ फिट हो जाती हैं।

3. भाषाई कुलीनता: अंग्रेजी का 'वनीला फ्लेवर' बनाम हिंदी का 'खड़ा मसाला'

यहाँ एक बड़ा दार्शनिक प्रश्न उठता है— आखिर अंग्रेजी की गाली में वो 'वज़न' क्यों नहीं है जो हिंदी की गाली में है?

अगर आप ऑफिस में कॉफी का कप गिरा दें और कहें "Oh F***!", तो आप 'कूल', 'आधुनिक' और 'उच्च-वर्गीय' लगते हैं। लेकिन अगर आप गलती से अपनी मातृभाषा का प्रयोग कर लें, तो आप 'गंवार' घोषित हो जाते हैं।

भाषा विज्ञान का एक नियम है— "विदेशी भाषा दिमाग से बोली जाती है, और मातृभाषा आंतों (Guts) से।"

  • अंग्रेजी गालियाँ (Diet Coke): ये शुगर-फ्री हैं। 'Bitch' या 'Bastard' जैसे शब्द होठों से फिसलते हैं, इनमें कोई घर्षण (Friction) नहीं है। ये महज़ एक सूचना है कि आप नाराज़ हैं।
  • हिंदी गालियाँ (देसी ठर्रा): हिंदी (या क्षेत्रीय भाषाओं) की गालियाँ गले से नहीं, नाभि से निकलती हैं। जब तक आपके मुंह का पूरा भूगोल न बदल जाए, जब तक महाप्राण ध्वनियों (भ, ध, च) का विस्फोट न हो, तब तक कुंठा बाहर नहीं आती।
"गाली का असली उद्देश्य सामने वाले को बुरा महसूस कराना नहीं, बल्कि खुद को हल्का महसूस कराना है। और सच यह है कि अंग्रेजी की गालियाँ 'हवाई फायरिंग' हैं—आवाज़ होती है पर लगती नहीं। जबकि हिंदी की गालियाँ 'देसी कट्टे' की गोली हैं—सीधे रूह को छूती हैं।"

4. पितृसत्ता का विद्रूप चेहरा (The Dark Side)

अब आते हैं इस व्यंग्य के गंभीर हिस्से पर।

कभी सोचा है कि हमारी 99% गालियाँ 'माँ' और 'बहन' पर ही क्यों केंद्रित हैं? पिता या भाई पर क्यों नहीं? हम उस देश में रहते हैं जहाँ 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' (जहाँ नारी की पूजा होती है) का श्लोक रटाया जाता है, लेकिन हमारे गुस्से का पहला शिकार उसी नारी की अस्मिता होती है।

गालियाँ सिर्फ शब्द नहीं होतीं, वे उस समाज का आइना होती हैं जिसने औरत को केवल 'इज्ज़त' की वस्तु मान लिया है। जब हम किसी पुरुष को अपमानित करना चाहते हैं, तो हम उसे गाली नहीं देते, हम उसके घर की स्त्रियों को निशाना बनाते हैं। यह भाषा का कूड़ा नहीं, बल्कि हमारे 'संस्कारों का कूड़ा' है।

5. निष्कर्ष: सेफ्टी वाल्व या प्रदूषण?

तो अंत में सवाल वही है—गालियाँ अच्छी हैं या बुरी?

गालियाँ 'नमक' की तरह हैं। अगर ये दोस्तों की महफिल में, हंसी-मज़ाक में थोड़ी-बहुत गिर जाएं, तो स्वाद बढ़ा देती हैं (आत्मीयता दिखाती हैं)। लेकिन अगर ये खाने (बातचीत) का मुख्य हिस्सा बन जाएं, तो ये पूरे चरित्र को खारा और बेस्वाद कर देती हैं।

हमें गालियों से उतनी नफरत नहीं होनी चाहिए, जितनी उस 'हिंसा' से होनी चाहिए जो इनके पीछे छिपी होती है। जब तक गाली 'सेफ्टी वाल्व' है, ठीक है; जिस दिन यह 'हथियार' बन जाए, उस दिन समझ लीजियेगा कि भाषा हार गई है।

लेखकीय टिप्पणी: यह लेख गालियों का समर्थन नहीं करता, बल्कि उनके अस्तित्व का विश्लेषण करता है। कृपया इसे पढ़कर 'प्रैक्टिकल' शुरू न करें! — Scribble Hindi

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3 Comments

  1. इंग्लिश में गाली देने वाले लगते कूल, हिन्दी में देने वाले लगते फूल 🖐

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  2. उचित शब्दों में सत्य क दर्शन 👏

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