दलित साहित्य एवं आत्मकथाएँ: वेदना से विद्रोह तक की कहानी

Piyush Mishra
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हिंदी साहित्य के विशाल भवन में सदियों तक सब कुछ लिखा गया—राजाओं की वीरता, नायिकाओं का सौंदर्य, प्रकृति का वर्णन और ईश्वर की भक्ति। लेकिन इस भवन के तहखाने में एक अंधेरा कोना था, जहाँ करोड़ों लोग सिसक रहे थे। उनकी सिसकियों को साहित्य में कोई जगह नहीं मिली।

1990 के दशक में जब हिंदी में दलित आत्मकथाओं (Dalit Autobiographies) का सैलाब आया, तो उसने उस अंधेरे कोने में रोशनी की एक ऐसी मशाल जलाई, जिसकी आंच ने पूरी साहित्यिक सत्ता को झुलसा कर रख दिया। ये किताबें महज 'आत्मकथा' नहीं थीं, ये 'आत्मा की चीख' थीं।

"हिंदी साहित्य में जिसे 'यथार्थवाद' (Realism) कहा जाता था, वह दलित आत्मकथाओं के सामने बौना साबित हो गया। प्रेमचंद के जिस 'होरी' और 'धनिया' पर हम गर्व करते थे, दलित आत्मकथाओं के पात्रों का दुख उनसे कहीं ज्यादा गहरा और विद्रोही निकला।"

आज के इस शोधपूर्ण लेख में हम दलित आत्मकथाओं की दुनिया में उतरेंगे। हम देखेंगे कि कैसे इन किताबों ने स्वतंत्रता संग्राम के 'अकहे इतिहास' को उजागर किया, कैसे इन्होंने भारतीय संस्कृति को नई नज़र दी और आज के दौर में इनकी प्रासंगिकता (Relevance) क्या है।

विस्तृत विषय सूची (Comprehensive Index)

1. दार्शनिक आधार: स्वानुभूति और दलित सौंदर्यशास्त्र

दलित साहित्य की नींव दो मुख्य स्तंभों पर टिकी है जो इसे सवर्ण साहित्य से अलग करते हैं।

A. स्वानुभूति बनाम सहानुभूति (Empathy vs Sympathy)

सवर्ण लेखक दलित पात्रों के प्रति 'सहानुभूति' (दया) दिखा सकता है। निराला की 'वह तोड़ती पत्थर' या प्रेमचंद की 'ठाकुर का कुआँ' बेहतरीन रचनाएँ हैं, लेकिन वे 'पर्यवेक्षक' (Observer) की नज़र से लिखी गई हैं।

इसके विपरीत, दलित आत्मकथाएँ 'स्वानुभूति' (Self-Experience) पर आधारित हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं— "जिसने कभी पैरों में बिवाई नहीं फटी, वह पीर पराई क्या जाने?" यहाँ लेखक ने भूख, अपमान और छुआछूत को किताबों में नहीं पढ़ा, बल्कि अपनी चमड़ी पर भोगा है।

B. दलित सौंदर्यशास्त्र (Dalit Aesthetics)

पारंपरिक साहित्य 'सत्यं शिवं सुंदरं' की बात करता है। वह 'चांद, फूल और प्रेम' में सुंदरता खोजता है। दलित साहित्य ने इस पैमाने को खारिज कर दिया।

नई परिभाषा: दलित साहित्यकार शरणकुमार लिंबाले के अनुसार, "जो साहित्य मनुष्य को दासता से मुक्ति दिलाए, वही सुंदर है। अगर भूख, गंदगी और आक्रोश का चित्रण मनुष्य को जगाता है, तो वह 'सुंदर' है।"

2. स्वतंत्रता संग्राम और दलित आत्मकथाएँ: एक अनकहा इतिहास

मुख्यधारा का इतिहास हमें बताता है कि 1947 से पहले पूरा भारत 'एक होकर' अंग्रेजों से लड़ रहा था। लेकिन दलित आत्मकथाएँ इस 'एका' (Unity) की पोल खोलती हैं।

डॉ. तुलसीराम अपनी आत्मकथा 'मुर्दहिया' में और अन्य लेखक अपने संस्मरणों में बताते हैं कि आजादी की लड़ाई के दौरान दलितों की स्थिति कितनी जटिल थी:

  • दोहरी गुलामी: सवर्ण समाज अंग्रेजों से आजादी मांग रहा था, लेकिन दलित समाज 'सवर्णों' और 'अंग्रेजों' दोनों से आजादी चाहता था।
  • गांधी बनाम अम्बेडकर: आत्मकथाओं में 1930-40 के दशक का वह द्वंद्व साफ दिखता है जहाँ दलित बस्तियों में गांधी के 'हरिजन' शब्द का विरोध हो रहा था और अम्बेडकर के 'दलित अधिकारों' की गूंज बढ़ रही थी।
  • बेगारी प्रथा: आजादी के नारों के बीच भी दलितों से 'बेगारी' (बिना पैसे के काम) करवाई जाती थी। आत्मकथाएँ बताती हैं कि कैसे 'वंदे मातरम' गाने वाले ज़मींदार घर जाकर दलित मजदूरों को पीटते थे।

ये किताबें हमें याद दिलाती हैं कि 1947 में मिली आजादी राजनीतिक थी, लेकिन सामाजिक आजादी की लड़ाई तो शुरू ही हुई थी।

3. 'त्रयी' का विश्लेषण: जूठन, मुर्दहिया और अपने-अपने पिंजरे

दलित साहित्य की चर्चा इन तीन कालजयी रचनाओं के बिना अधूरी है।

कृति लेखक महत्व और विश्लेषण
अपने-अपने पिंजरे (1995) मोहनदास नैमिशराय यह हिंदी की पहली दलित आत्मकथा है। लेखक ने दिखाया कि कैसे गरीबी और जाति व्यवस्था इंसान को एक 'पिंजरे' में कैद कर देती है। यह 'चुप्पी तोड़ने' वाली किताब थी।
जूठन (1997) ओमप्रकाश वाल्मीकि इसे दलित साहित्य का घोषणा-पत्र (Manifesto) कहा जाता है। इसमें शिक्षा के लिए संघर्ष, 'जूठन' खाने की विवशता और "तुम तो चूहड़े हो, पढ़कर क्या करोगे" जैसे ताने हैं। यह आक्रोश और प्रतिरोध की किताब है।
मुर्दहिया (2010) डॉ. तुलसीराम यह सबसे अनूठी आत्मकथा है। इसमें रोना-धोना नहीं, बल्कि हँसी और व्यंग्य है। यह लोक-जीवन, अंधविश्वास और 'अपशकुन' माने जाने वाले एक बच्चे की प्रोफेसर बनने तक की यात्रा है।
दलित आत्मकथाएं

4. अन्य प्रमुख हस्ताक्षर और उनका योगदान

सिर्फ उपरोक्त तीन नहीं, बल्कि कई अन्य लेखकों ने इस विधा को समृद्ध किया है।

A. सूरजपाल चौहान ('तिरस्कृत' और 'संतप्त')

उनकी आत्मकथा 'तिरस्कृत' (2002) बहुत बेबाक है। वे लिखते हैं कि सफलता पाने के बाद भी जाति आपका पीछा नहीं छोड़ती। वे अपने ही समाज की उन कुरीतियों (जैसे शराबखोरी) पर भी प्रहार करते हैं जो दलितों को कमजोर करती हैं।

B. शिवराज सिंह बेचैन ('मेरा बचपन मेरे कंधों पर')

यह शीर्षक ही बहुत मार्मिक है। शिवराज सिंह बेचैन ने बाल मजदूरी की भयावहता को लिखा है। कैसे एक बच्चे का बचपन उसके कंधों पर लदे काम के बोझ तले कुचल जाता है, इसका इससे बेहतर चित्रण हिंदी साहित्य में नहीं मिलता।

C. माता प्रसाद ('झोपड़ी से राजभवन')

अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे माता प्रसाद जी की यह आत्मकथा एक 'सक्सेस स्टोरी' है। यह दिखाती है कि लोकतंत्र और संविधान की ताकत से एक झोपड़ी में रहने वाला व्यक्ति राजभवन तक कैसे पहुँच सकता है। यह दलित युवाओं को प्रेरणा देती है।

D. रूपनारायण सोनकर ('नागफनी')

जैसे नागफनी (Cactus) बिना पानी के रेगिस्तान में उगता है, वैसे ही दलित समाज अभावों में जीता है। सोनकर जी की यह आत्मकथा इसी जिजीविषा (Survival) की कहानी है।

5. दलित स्त्री लेखन: पितृसत्ता और जाति का द्वंद्व

दलित महिला आत्मकथाएँ दलित साहित्य का सबसे विस्फोटक हिस्सा हैं। दलित पुरुष तो केवल बाहर (सवर्णों से) लड़ रहा था, लेकिन दलित स्त्री 'बाहर' जातिवाद से और 'घर के अंदर' पितृसत्ता से लड़ रही थी।

  • कौशल्या बैसंत्री ('दोहरा अभिशाप'): हिंदी की पहली दलित महिला आत्मकथा। उन्होंने लिखा कि कैसे दलित पुरुष, जो बाहर समानता की बात करते हैं, घर में अपनी पत्नियों को गुलाम समझते हैं।
  • सुशीला टाकभौरे ('शिकंजे का दर्द'): इन्होंने स्त्री के शरीर और मन पर जाति की मार को उकेरा है।
  • रजनी तिलक ('अपनी ज़मीं अपना आसमाँ'): यह आत्मकथा आंदोलनकारी स्त्री की गवाही है।

6. सांस्कृतिक प्रभाव: मिथकों और भाषा का पुनर्पाठ

दलित आत्मकथाओं का सबसे बड़ा योगदान सांस्कृतिक क्षेत्र में है।

भाषा का लोकतंत्रीकरण: इन आत्मकथाओं ने हिंदी के 'संस्कृतनिष्ठ' चेहरे पर कालिख पोत दी। लेखकों ने अपनी स्थानीय बोलियों (भोजपुरी, अवधी, हरियाणवी) और तथाकथित 'गंदे' शब्दों का प्रयोग बेझिझक किया। उन्होंने साबित किया कि दर्द की भाषा व्याकरण की मोहताज नहीं होती।
  • मिथकों का विखंडन: इन किताबों ने एकलव्य, शम्बूक और कर्ण को 'विलेन' या 'बेचारा' मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने इन पात्रों को अपना 'नायक' (Hero) घोषित किया।
  • लोक-संस्कृति का दस्तावेज़ीकरण: 'मुर्दहिया' जैसी किताबों में दलितों के लोक-गीत, देवी-देवता (जैसे- चमहरिया माई, डीह बाबा) और पूजा-पद्धतियों का जो विवरण मिलता है, वह किसी एंथ्रोपोलॉजी (Anthropology) की रिसर्च से कम नहीं है।

7. वर्तमान प्रासंगिकता: रोहित वेमुला से आज तक

क्या आज 21वीं सदी में इन आत्मकथाओं की जरूरत है?

जवाब है— हाँ, पहले से कहीं ज्यादा।

जब हम रोहित वेमुला की आत्महत्या (संस्थागत हत्या) का पत्र पढ़ते हैं, जिसमें वह लिखता है— "My birth is my fatal accident", तो हमें 'जूठन' याद आती है।

  • पहचान की राजनीति: आज का दलित युवा इन किताबों को पढ़कर अपनी 'पहचान' (Identity) पर शर्मिंदा नहीं होता, बल्कि गर्व करता है।
  • आरक्षण और मेरिट की बहस: जो लोग कहते हैं कि "दलितों में मेरिट नहीं होती", उन्हें ओमप्रकाश वाल्मीकि की 'जूठन' पढ़नी चाहिए कि कैसे उन्हें कक्षा में बैठने भी नहीं दिया जाता था। ये किताबें 'मेरिट' के मिथक को तोड़ती हैं।

8. निष्कर्ष: एक नई सामाजिक चेतना

हिंदी की दलित आत्मकथाएँ केवल 'दुखड़ा' नहीं हैं, न ही ये किसी के प्रति नफरत फैलाती हैं। ये तो एक 'आइना' हैं। ऐसा आइना जिसे भारतीय समाज ने सदियों तक धूल से ढक रखा था।

ये रचनाएँ वेदना (Pain) से शुरू होती हैं, विद्रोह (Revolt) में बदलती हैं और अंततः एक समतामूलक चेतना (Consciousness) पर खत्म होती हैं।

साहित्य के नजरिए से देखें तो इन्होंने हिंदी को 'मठों' से निकालकर 'झोपड़ियों' तक पहुँचाया है। और समाज के नजरिए से, इन्होंने हमें बेहतर इंसान बनने का मौका दिया है। जैसा कि डॉ. धर्मवीर भारती ने कहा था— "दलित साहित्य, साहित्य का नहीं, बल्कि समाज के पुनर्जागरण का आंदोलन है।"

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