मैला आंचल: सम्पूर्ण समीक्षा और विश्लेषण | पात्र, परिवेश और आंचलिकता

Piyush Mishra
0
मैला आँचल


मैला आंचल

भारतीय ग्राम-जीवन की एक जीवंत दस्तावेजी महागाथा


"इसमें फूल भी है, शूल भी; धूल भी है, गुलाब भी; कीचड़ भी है, चंदन भी; सुंदरता भी है, कुरूपता भी... मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया।" — फणीश्वरनाथ रेणु (भूमिका)

हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर 1954 में जब 'मैला आंचल' का उदय हुआ, तो उसने उपन्यास लेखन की स्थापित मान्यताओं को झकझोर कर रख दिया। प्रेमचंद के 'गोदान' के बाद यदि किसी कृति ने भारतीय जनमानस, विशेषकर ग्रामीण जीवन को उसकी सम्पूर्ण नग्नता, विद्रूपता और जिजीविषा के साथ प्रस्तुत किया है, तो वह फणीश्वरनाथ रेणु का 'मैला आंचल' ही है।

यह उपन्यास केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि बिहार के पूर्णिया जिले के एक पिछड़े गाँव 'मेरीगंज' का समाजशास्त्रीय दस्तावेज है। रेणु ने यहाँ किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि 'मिट्टी' की कथा कही है। यह लेख इस महान कृति के उन तमाम पहलुओं को उजागर करेगा जो इसे कालजयी बनाते हैं।

1. आंचलिकता: एक नई दृष्टि (The Concept of Aanchalikta)

साहित्य में 'मैला आंचल' का सबसे बड़ा योगदान 'आंचलिकता' की अवधारणा को स्थापित करना है। लेकिन यह आंचलिकता आखिर है क्या?

अंचल ही नायक है (Region as the Protagonist)

पारंपरिक उपन्यासों में एक नायक होता है (जैसे गोदान में होरी), जिसके इर्द-गिर्द पूरी कहानी घूमती है। रेणु ने इस ढांचे को तोड़ दिया। 'मैला आंचल' में कोई एक व्यक्ति नायक नहीं है। यहाँ का नायक स्वयं 'अंचल' (क्षेत्र) है। मेरीगंज की धरती, वहाँ की हवा, महामारियाँ, अंधविश्वास, गीत और झगड़े—ये सब मिलकर नायक की भूमिका निभाते हैं। पात्र आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन अंचल अपनी पूरी सजीवता के साथ अंत तक बना रहता है।

रेणु का उद्देश्य केवल ग्रामीण जीवन का रोमानी चित्रण करना नहीं था, बल्कि वे उस 'मैलेपन' को दिखाना चाहते थे जिसे अक्सर साहित्य में अनदेखा किया जाता रहा। यहाँ आंचलिकता का अर्थ है—जीवन को उसके कच्चे (Raw) रूप में प्रस्तुत करना, बिना किसी शहरी बनावट के।

2. मेरीगंज: कथा का कैनवास और इतिहास

उपन्यास का केंद्र बिहार का 'मेरीगंज' गाँव है। इस गाँव के नामकरण के पीछे भी एक इतिहास है जो औपनिवेशिक भारत की याद दिलाता है। अंग्रेजी राज के समय यहाँ एक नीलहे साहब (Indigo Planter) मार्टिन ने अपनी पत्नी 'मेम मेरी' (Mary) के नाम पर इस गाँव का नाम रखा था। 'मेरी' की मृत्यु मलेरिया से हुई थी, और मार्टिन पागल होकर मर गया था।

यह पृष्ठभूमि उपन्यास के आरंभ में ही यह संकेत दे देती है कि यह क्षेत्र बीमारी, शोषण और त्रासदी की विरासत समेटे हुए है। मेरीगंज केवल एक गाँव नहीं है, यह स्वाधीनता प्राप्ति के समय के समस्त भारतीय गांवों का प्रतीक (Microcosm) है।

3. सामाजिक ताना-बाना: जाति और वर्ग संघर्ष

रेणु ने मेरीगंज के माध्यम से भारतीय ग्रामीण समाज की सबसे कड़वी सच्चाई—जातिवाद—को उकेरा है। मेरीगंज एक इकाई नहीं है, वह कई 'टोलों' में खंडित है। यहाँ इन्सान गाँव में नहीं, 'टोले' में रहता है।

  • राजपूत टोली: इसका नेतृत्व ठाकुर रामकृपाल सिंह करते हैं। यह सत्ता और शक्ति का प्रतीक है।
  • कायस्थ टोली: नेतृत्व तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद करते हैं। यह वर्ग बुद्धि और कुटिलता के बल पर गाँव पर राज करता है।
  • यादव टोली: शारीरिक श्रम और पशुपालन से जुड़े लोग।
  • ब्राह्मण टोली: ज्योतिषी जी जैसे पात्र जो धर्म के नाम पर पाखंड फैलाते हैं।
  • संथाल और दलित: हाशिये पर खड़े लोग, जिनका केवल शोषण होता है।

रेणु दिखाते हैं कि आजादी की लड़ाई तो 'भारत माता' के लिए लड़ी गई थी, लेकिन आजादी मिलते ही गाँव वाले 'जाति' की लड़ाई में जुट गए। "जाति ही सबसे बड़ी पार्टी है"—यह संवाद उस दौर की विडंबना को उजागर करता है।

4. राजनीतिक चेतना: मोहभंग और गांधीवाद का अंत

उपन्यास का कालखंड 1946 से 1948 के बीच का है। यह वह समय था जब भारत गुलाम से आजाद हो रहा था। लेकिन रेणु हमें दिखाते हैं कि यह आजादी गाँव तक पहुँचते-पहुँचते कैसे अपना अर्थ खो देती है।

मोहभंग (Disillusionment)

प्रेमचंद के साहित्य में 'स्वराज' एक सपना था, लेकिन रेणु के साहित्य में वह 'स्वराज' एक छल बनकर सामने आता है। गाँव वालों को उम्मीद थी कि "सुराज" (स्वराज) आएगा तो राम-राज्य होगा। लेकिन हुआ क्या? केवल शोषक बदल गए। गोरे अंग्रेजों की जगह 'भूरे साहबों' (कांग्रेसी नेताओं) ने ले ली। जो तहसीलदार पहले अंग्रेजों का वफादार था, वही रातों-रात खादी पहनकर कांग्रेसी बन जाता है।

उपन्यास में बावनदास की हत्या भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। बावनदास एक सच्चा गांधीवादी था। उसकी हत्या तस्करों द्वारा की जाती है और उसकी लाश को भारत-नेपाल सीमा पर नदी में फेंक दिया जाता है। यह केवल एक पात्र की मौत नहीं थी, यह गांधीवाद की नैतिक हत्या थी।

5. पात्र विश्लेषण: प्रतीक और संवेदना

रेणु के पात्र मिट्टी से गढ़े हुए हैं। वे न तो पूरी तरह देवता हैं और न ही पूरी तरह राक्षस।

क. डॉ. प्रशांत (Dr. Prashant) - "जड़ की खोज"

प्रशांत उपन्यास का सबसे बौद्धिक पात्र है। वह एक अज्ञात कुलशील (अनाथ) है। वह मेरीगंज में मलेरिया और काला-ज़ार पर रिसर्च करने आता है।
प्रतीकात्मक अर्थ: प्रशांत 'आधुनिक विज्ञान' और 'मानवतावाद' का प्रतीक है। वह शहर की सुख-सुविधा छोड़कर गाँव की 'मिट्टी' से जुड़ना चाहता है। वह अपनी जड़ों (Roots) को खोज रहा है।

ख. बावनदास (Bawandas) - "नैतिकता का बौनापन"

बावनदास शारीरिक रूप से बौना है, लेकिन उसका चरित्र हिमालय जैसा ऊँचा है। रेणु ने उसे बौना इसलिए दिखाया है ताकि वे बता सकें कि राजनीति के बड़े-बड़े खिलाड़ियों के बीच अब गांधीवाद 'बौना' और असहाय हो गया है।

ग. कालीचरण (Kalicharan) - "युवा आक्रोश"

जहाँ बावनदास पुराने आदर्शों का प्रतीक है, वहीं कालीचरण 'नए भारत' का प्रतीक है। वह समाजवादी (Socialist) विचारधारा का है। वह अन्याय को सहता नहीं, बल्कि उसका प्रतिकार करता है।

6. भाषाई सौंदर्य और शिल्प

रेणु की भाषा ही 'मैला आंचल' की आत्मा है। उन्होंने हिंदी उपन्यास की भाषा को एक नया संस्कार दिया।

  1. ध्वन्यात्मकता: रेणु शब्दों के माध्यम से दृश्य और ध्वनि दोनों पैदा करते हैं। जैसे ढोल की आवाज़— "धागिड़-धागिड़... धा-तिन-धा!"
  2. शब्दों का देशीकरण: उन्होंने अंग्रेजी शब्दों को वैसे ही लिखा है जैसे ग्रामीण बोलते हैं। जैसे— 'टेशन' (Station), 'कलट्टर' (Collector), 'डिगरीज' (Degree)। यह भाषा को विश्वसनीयता प्रदान करता है।
  3. लोकगीत: उपन्यास में गीतों की भरमार है। ये गीत कथा को रोकने का काम नहीं करते, बल्कि उसे गति देते हैं।

7. निष्कर्ष: प्रासंगिकता (Relevance)

'मैला आंचल' का अंत एक बहुत ही सकारात्मक और उम्मीद भरे नोट पर होता है। डॉ. प्रशांत कहते हैं— "मैं प्यार करता हूँ, इस मिट्टी से... इसमें जीवन के कीटाणु भरे हुए हैं।"

रेणु यह स्वीकार करते हैं कि आंचल मैला है—उसमें गरीबी है, बीमारी है, जातिवाद है। लेकिन फिर भी, वह आंचल 'माँ' का आंचल है। आज जब हम 'स्मार्ट विलेज' की बात करते हैं, तो 'मैला आंचल' हमें याद दिलाता है कि भारत की आत्मा अभी भी उन सुदूर गांवों में बसती है। फणीश्वरनाथ रेणु का यह उपन्यास भारतीय साहित्य की एक अनमोल धरोहर है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: मैला आंचल का वास्तविक नायक (Hero) कौन है?

पारंपरिक उपन्यासों की तरह 'मैला आंचल' में कोई एक व्यक्ति नायक नहीं है। इसका वास्तविक नायक स्वयं 'मेरीगंज' गाँव और वहाँ का अंचल (Region) है। पात्र आते-जाते हैं, लेकिन अंचल अपनी समग्रता में अंत तक बना रहता है।

प्रश्न 2: गोदान और मैला आंचल में मुख्य अंतर क्या है?

प्रेमचंद का 'गोदान' समस्या-प्रधान और चरित्र-प्रधान है। जबकि रेणु का 'मैला आंचल' परिवेश-प्रधान (Atmosphere-centric) है। इसमें समस्या से ज्यादा जोर उस 'माहौल', संस्कृति, बोली और 'अंचल' को जीवंत करने पर है।

प्रश्न 3: बावनदास की मृत्यु किसका प्रतीक है?

बावनदास की हत्या स्वतंत्र भारत में 'गांधीवाद की नैतिक हत्या' का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि राजनीति में अब आदर्शवाद के लिए कोई जगह नहीं बची है।

प्रश्न 4: क्या 'मैला आंचल' हिंदी का प्रथम आंचलिक उपन्यास है?

तकनीकी रूप से नागार्जुन का 'बलचनमा' (1952) पहले प्रकाशित हुआ था। लेकिन 'आंचलिकता' को एक साहित्यिक शिल्प के रूप में पूर्ण प्रतिष्ठा 1954 में प्रकाशित 'मैला आंचल' से ही मिली। अतः आलोचक इसे ही हिंदी का प्रथम सर्वश्रेष्ठ आंचलिक उपन्यास मानते हैं।

Post a Comment

0 Comments

Post a Comment (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!