UGC का नया फरमान: क्या अब 'सवर्ण' होना ही सबसे बड़ा गुनाह है?

Piyush Mishra
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कॉलेज यानी मौज-मस्ती, कैंटीन की चाय और बेफिक्र ज़िन्दगी... यही सोचा था न? पर भूल जाओ। आज के टाइम में यूनिवर्सिटी पढ़ाई का मंदिर कम और 'वोट बैंक की राजनीति' का अखाड़ा ज्यादा बन गयी है।

हाल ही में UGC (University Grants Commission) ने भेदभाव (Discrimination) रोकने के नाम पर जो नए दिशा-निर्देश (Guidelines) जारी किये हैं, उन्हें देखकर हंसी भी आती है और खून भी खौलता है। सरकार और उसका सिस्टम यह दिखावा कर रहे हैं कि वो "सबको बराबर" कर रहे हैं, लेकिन असलियत में वो समाज के बीच एक ऐसी गहरी खाई खोद रहे हैं जिसे भरना अब नामुमकिन सा लगता है।

और इस पूरे 'सियासी खेल' में अगर किसी की बलि चढ़ रही है, तो वो है— अनारक्षित वर्ग (General Category) का छात्र। वो छात्र जिसका कसूर सिर्फ इतना है कि वो किसी 'खास जाति' में पैदा नहीं हुआ।

1. आखिर क्या हैं UGC के ये 'नए नियम'? (समझिए आसान भाषा में)

इससे पहले कि हम इन नियमों की आलोचना करें, यह जानना ज़रूरी है कि आखिर सरकार ने नया फरमान सुनाया क्या है। UGC ने सभी यूनिवर्सिटी और कॉलेजों को जातिगत भेदभाव (Caste Discrimination) रोकने के लिए सख्त निर्देश दिए हैं।

📋 UGC की नई गाइडलाइन्स के मुख्य बिंदु:

  • एंटी-डिस्क्रिमिनेशन सेल (Anti-Discrimination Cell): हर कॉलेज/यूनिवर्सिटी में SC/ST/OBC छात्रों के लिए एक अलग सेल बनाना अनिवार्य होगा।
  • शिकायत रजिस्टर: प्रिंसिपल/रजिस्ट्रार के ऑफिस में एक शिकायत रजिस्टर रखना होगा जहाँ आरक्षित वर्ग के छात्र भेदभाव की शिकायत दर्ज करा सकें।
  • तुरंत कार्रवाई: शिकायत मिलते ही सेल को तुरंत जांच करनी होगी और दोषी पाए जाने पर (चाहे वो छात्र हो या प्रोफेसर) सख्त कार्रवाई करनी होगी।
  • वेबसाइट पर जानकारी: कॉलेज की वेबसाइट पर इस सेल के सदस्यों के नाम और नंबर सार्वजनिक करने होंगे।
  • जागरूकता कार्यक्रम: कॉलेजों को लगातार ऐसे प्रोग्राम करने होंगे जो भेदभाव के खिलाफ हों।

सुनने में ये नियम बहुत अच्छे लगते हैं और इनकी मंशा भी 'न्याय' दिलाना है। लेकिन समस्या नियम में नहीं, बल्कि उसके एकतरफा लागू होने (One-sided Implementation) और दुरुपयोग (Misuse) में है। यह नियम मानकर चलता है कि 'पीड़ित' सिर्फ आरक्षित वर्ग का ही हो सकता है, और 'शोषक' हमेशा अनारक्षित वर्ग का ही होगा।

2. 'विक्टिम कार्ड' का नया खेल और जनरल वालों की शामत

UGC का फरमान साफ़ है—हर बात पर कमेटी बिठाओ, हर शिकायत पर एक्शन लो। सुनने में यह 'न्याय' लगता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत क्या है? हकीकत यह है कि यह कानून एकतरफा तलवार बन गया है।

आज कॉलेज के हॉस्टल में एक जनरल कैटेगरी का लड़का किसी आरक्षित वर्ग के लड़के से ऊंची आवाज़ में बहस करने से भी डरता है। चाहे गलती किसी की भी हो, सवर्ण छात्र को पीछे हटना पड़ता है। क्यों?

"भाई, उससे पंगा मत लेना, गलती से भी मुँह से कुछ निकल गया तो सीधा 'एट्रोसिटी एक्ट' (Atrocity Act) लगेगा और तेरा करियर, तेरी डिग्री सब ख़त्म।"

ये डर (Fear) आज हर कॉलेज में घुस चुका है।

  • अगर सवर्ण छात्र को कोई कुछ बोल दे, तो वो 'मज़ाक' है, उसे 'सहन' करना पड़ता है।
  • लेकिन अगर सवर्ण छात्र अपनी आत्मरक्षा में भी पलटकर जवाब दे दे, तो वो 'जातिगत शोषण' का अपराधी बन जाता है।

क्या ये भेदभाव नहीं है? क्या जनरल कैटेगरी के छात्र के पास दिल नहीं होता? क्या उसे मानसिक प्रताड़ना (Mental Harassment) महसूस नहीं होती? लेकिन अफ़सोस, UGC की गाइडलाइन्स में 'जनरल वालों के आंसुओं' के लिए कोई कमेटी नहीं है।

3. डिवाइड एंड रूल 2.0: सरकार का असली प्लान

अंग्रेज तो 1947 में चले गए, लेकिन हमारे नेताओं को अपनी कुर्सी बचाने का एक 'ब्रह्मास्त्र' दे गए— "बांटो और राज करो" (Divide and Rule)।

सरकारें, चाहे वो किसी भी पार्टी की हों, कभी नहीं चाहतीं कि कॉलेज के छात्र एक होकर फीस वृद्धि, बेरोजगारी या गिरती शिक्षा व्यवस्था पर सवाल पूछें। वो जानती हैं कि अगर 'पंडित' और 'दलित' साथ में बैठकर चाय पीने लगे, तो नेताओं की दुकाने बंद हो जाएंगी।

कंफ्यूजन की राजनीति

सरकार का खेल देखिये:

  • कभी 'De-reservation' का ड्राफ्ट लाया जाता है (ताकि जनरल वालों को लगे कि सरकार उनके साथ है)।
  • जैसे ही हंगामा होता है, उसे वापस लेकर 'सख्त डिस्क्रिमिनेशन गाइडलाइन्स' थोप दी जाती हैं (ताकि आरक्षित वर्ग खुश हो जाए)।

ये पेंडुलम की तरह हमें इधर से उधर घुमा रहे हैं। दोनों वर्गों को आपस में लड़ाकर ये साइड में बैठकर मलाई खा रहे हैं।

New UGC rules

4. मेरिट की हत्या: टैलेंट गया तेल लेने!

इस तुष्टिकरण (Appeasement) का सबसे भयानक असर हमारी 'क्वालिटी' पर पड़ रहा है। सोचिये, एक जनरल कैटेगरी का प्रोफेसर है। वो अपनी क्लास में किसी छात्र को डांटने से पहले दस बार सोचता है। उसे डर है कि अगर मैंने इसे 'कम नंबर' दिए या 'असाइनमेंट' के लिए टोका, तो कल को मेरे ऊपर 'जातिगत भेदभाव' की इंक्वायरी बैठ जाएगी।

नतीजा क्या निकल रहा है?

  • टीचर ने पढ़ाना छोड़कर 'सेफ गेम' खेलना शुरू कर दिया है। "पास करो और जान छुड़ाओ" की नीति चल रही है।
  • जो छात्र सच में मेहनत कर रहा है (चाहे वो किसी भी जाति का हो), उसकी मेहनत की कोई कद्र नहीं रही।
  • एक अयोग्य व्यक्ति को सिस्टम में जबरदस्ती फिट किया जा रहा है, जिससे कल को न अच्छे डॉक्टर मिलेंगे, न इंजीनियर, न शिक्षक।

ब्रेन ड्रेन (Brain Drain) की असली वजह

आज अगर भारत का टैलेंटेड युवा विदेश भाग रहा है, तो उसकी वजह सिर्फ 'पैसा' नहीं है। वजह है यह 'घुटन'।

एक जनरल छात्र 95% लाकर भी धक्के खाता है, और उसे पता है कि यहाँ उसकी कद्र नहीं है। इसलिए वो अपना देश छोड़ने पर मजबूर है। हम 'विश्वगुरु' बनने का सपना देखते हैं, लेकिन अपने ही घर के 'नायकों' (Heroes) को भगा रहे हैं।

5. आर्थिक आधार (EWS) vs जाति: असली समाधान से डरते क्यों हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार 'गरीबी' को आधार क्यों नहीं बनाती?

क्या एक गरीब ब्राह्मण या राजपूत का बेटा भूखा नहीं सोता? क्या एक अमीर अफसर के बेटे को (जो मर्सिडीज़ में कॉलेज आता है) आरक्षण या विशेष सुरक्षा की ज़रूरत है?

लेकिन सरकार यह कभी नहीं करेगी। क्योंकि 'गरीबी' मिटाना मुश्किल काम है, उसमे मेहनत लगती है। लेकिन 'जाति' के नाम पर कानून बनाना आसान है, बस एक साइन करो और वोट पक्के।

UGC के ये नए नियम इसी तुष्टिकरण का हिस्सा हैं। ये कॉलेज के माहौल को सुधारने के लिए नहीं, बल्कि जनरल वालों को यह अहसास दिलाने के लिए हैं कि— "तुम अब इस देश के दोयम दर्जे (Second Class) के नागरिक हो।"

6. प्रोफेसर भर्ती में 'NFS' का काला खेल

यूनिवर्सिटीज़ में एक और गंदा खेल चलता है जिसे NFS (Not Found Suitable) कहते हैं।

जब किसी वैकेंसी में जनरल उम्मीदवार बहुत होशियार होता है, तो अक्सर उसे रिजेक्ट करने के लिए इंटरव्यू में कम नंबर दिए जाते हैं। और आरक्षित सीटों पर अगर कोई उनका 'पसंदीदा' नहीं मिलता, तो उसे NFS कर दिया जाता है ताकि वो सीट खाली रहे और बाद में बैकलॉग के नाम पर भरी जाए।

एक जनरल कैंडिडेट PhD करता है, नेट (NET) निकालता है, रिसर्च पेपर लिखता है, लेकिन अंत में उसे सिर्फ इसलिए छांट दिया जाता है क्योंकि रोस्टर सिस्टम में उसकी जगह ही नहीं बनती। यह हताशा (Frustration) युवाओं को अंदर से खाए जा रही है।

new UGC rules

निष्कर्ष: अब जागने का वक़्त है!

दोस्तों, चाहे आप किसी भी वर्ग से हों—आरक्षित या अनारक्षित—यह समझ लीजिये कि ये नेता आपके सगे नहीं हैं।

UGC के ये नए नियम 'न्याय' देने के लिए नहीं, बल्कि आपको उलझाए रखने के लिए हैं। अगर आप जनरल केटेगरी से हैं, तो आपको शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है। अपनी आवाज़ उठाना आपका भी हक़ है।

जनरल वालों को 'दबाने' से समाज का भला नहीं होगा, और न ही किसी को 'बिना मेहनत' आगे बढ़ाने से देश तरक्की करेगा। जब तक हम इस 'सरकारी नशे' को छोड़कर एक-दूसरे को 'सिर्फ स्टूडेंट' की नज़र से नहीं देखेंगे, तब तक हम ऐसे ही पिसते रहेंगे।

आंखें खोलो, वरना डिग्री तो मिल जाएगी, लेकिन देश और भविष्य दोनों गर्त में चले जाएंगे!

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2 Comments

  1. बंधुत्व की भावना को ही मिटाने का प्रयास कर रहा ये सिस्टम...... सटीक विश्लेषण 👍👏

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  2. वापस पीछे हटना ही था

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