साहित्य की दुनिया में कुछ लेखक 'फूल' बरसाते हैं, और कुछ 'इत्र' छिड़कते हैं। लेकिन एक लेखक ऐसा था जो शब्दों से नहीं, बल्कि नश्तर (Surgical Knife) से लिखता था।
वो घाव को सहलाता नहीं था, बल्कि उसे कुरेद कर उसमें से मवाद (Pus) बाहर निकालता था।
नाम था— सआदत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto)।
समाज ने उन्हें गालियां दीं, कोर्ट में घसीटा, पागलखाने भेजा, और 'अश्लील' कहा। लेकिन आज, उनकी मौत के 70 साल बाद, वही समाज उन्हें "उर्दू साहित्य का सबसे बेबाक लेखक" मानता है। यह कहानी उसी 'बदनाम' मंटो की है जो बॉम्बे से प्यार करता था, लेकिन जिसे हालात ने लाहौर की सड़कों पर शराब में डुबोकर मार दिया।
इस लेख में क्या है (Table of Contents)
1. बॉम्बे का 'मंटो' और बंटवारे का दर्द
मंटो का जन्म 11 मई 1912 को पंजाब (लुधियाना) में हुआ था, लेकिन उनकी रूह बॉम्बे (मुंबई) में बसती थी। वो फिल्मों के लिए लिखते थे, मशहूर एक्टर अशोक कुमार और श्याम उनके जिगरी दोस्त थे। मंटो कहा करते थे— "मैं चलता-फिरता बॉम्बे हूँ।"
लेकिन 1947 में जब मुल्क बंटा, तो मंटो भी अंदर से बंट गए।
श्याम का वो 'डरावना' मज़ाक
मंटो पाकिस्तान क्यों गए, इसका एक रोंगटे खड़े करने वाला किस्सा है। दंगों के दौरान मंटो अपने हिंदू दोस्त और एक्टर श्याम के साथ बैठे थे। शरणार्थियों की दर्दनाक कहानियां सुनकर श्याम गुस्से में आ गए और बोले— "मंटो, कसम से, अभी मेरा खून इतना खौल रहा है कि मैं तुम्हें भी मार सकता हूँ।"
श्याम ने यह जज्बात में कहा था, लेकिन मंटो को उस एक पल में एहसास हो गया कि जब धर्म का नशा चढ़ता है, तो दोस्ती और इंसानियत सब धुआं हो जाती है। इसी डर और गुस्से में मंटो जनवरी 1948 में बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान (लाहौर) चले गए।
2. निजी ज़िंदगी: शराब, सफिया और सफेद कुर्ता
मंटो को अक्सर लोग सिर्फ उनकी कहानियों से जानते हैं, लेकिन एक 'इंसान' के तौर पर वो बेहद दिलचस्प थे। उनकी निजी जिंदगी विरोधाभासों (Contradictions) से भरी थी।
वो लेखक जो 'उर्दू' में फेल हो गया
यह सुनने में अजीब लगता है, लेकिन उर्दू साहित्य का सबसे बड़ा जादूगर स्कूल के दिनों में पढ़ने में बहुत कमज़ोर था। मंटो अपनी मैट्रिक (10वीं) की परीक्षा में तीन बार फेल हुए थे। और सबसे बड़ी विडंबना (Irony) यह थी कि एक बार वो 'उर्दू' विषय में ही फेल हो गए थे।
सफिया: मंटो की ढाल
मंटो की पत्नी का नाम सफिया था। वो एक कश्मीरी लड़की थीं और मंटो से बिलकुल अलग—शांत और धैर्यवान। मंटो कहते थे कि "सफिया न होती तो मैं कब का मर गया होता।" मंटो की शराब की लत, कोर्ट कचहरी के चक्कर और घर में पैसों की तंगी—सफिया ने यह सब कुछ बर्दाश्त किया, लेकिन कभी मंटो का साथ नहीं छोड़ा।
शौक: सफेद कुर्ता और सोने के काम वाली जूती
मंटो कोई 'झोला-छाप' लेखक नहीं थे। उन्हें सजने-संवरने का बहुत शौक था। वो अक्सर कड़क इस्त्री किया हुआ सफेद कुर्ता-पाजामा पहनते थे और पैरों में सोने के तार वाली जूतियां। उन्हें महंगी सिगरेट पीने और बढ़िया पेन इस्तेमाल करने का भी शौक था, भले ही जेब में पैसे हो या न हो।
शराब और डिप्रेशन
पाकिस्तान जाने के बाद मंटो को अपने बॉम्बे की बहुत याद आती थी। वहां के माहौल में वो घुटने लगे थे। इसी गम को भुलाने के लिए उन्होंने सस्ती शराब पीनी शुरू कर दी। यह शौक नहीं, उनकी मजबूरी बन गयी थी, जिसने धीरे-धीरे उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया।
3. अश्लीलता के 6 मुक़दमे: सच या गुनाह?
मंटो ने कभी राजा-रानियों की कहानियां नहीं लिखीं। उन्होंने वेश्याओं (Sex workers), दलालों और शराबी पतियों की कहानियां लिखीं। वो कहते थे—
मंटो पर कुल 6 बार अश्लीलता (Obscenity) का मुक़दमा चला:
- भारत में (ब्रिटिश राज): 'बू', 'काली सलवार' और 'धुआं' कहानियों के लिए।
- पाकिस्तान में: 'खोल दो', 'ठंडा गोश्त' और 'ऊपर नीचे और दरमियान' के लिए।
विडंबना देखिये—मंटो को न भारत की अदालतों ने बख्शा, न पाकिस्तान की। जजों ने उन पर जुर्माना लगाया, लेकिन मंटो ने माफी कभी नहीं मांगी।
4. 'टोबा टेक सिंह': पागलपन या समझदारी?
बंटवारे पर हज़ारों किताबें लिखी गयीं, लेकिन मंटो की छोटी सी कहानी 'टोबा टेक सिंह' (Toba Tek Singh) सबसे भारी साबित हुई।
यह कहानी लाहौर के एक पागलखाने की है। जब सरकारों ने तय किया कि पागलों का भी बंटवारा होगा—हिंदू पागल भारत जाएंगे और मुस्लिम पागल पाकिस्तान—तो वहां हड़कंप मच गया।
कहानी का मुख्य पात्र, बिशन सिंह, सिर्फ एक ही सवाल पूछता है— "टोबा टेक सिंह (उसका गाँव) कहाँ है? हिंदुस्तान में या पाकिस्तान में?"
कहानी का अंत (The Climax):
जब सिपाहियों ने बिशन सिंह को जबरदस्ती बॉर्डर पार कराने की कोशिश की, तो वो दोनों मुल्कों के बीच की 'No Man's Land' (वह ज़मीन जो किसी की नहीं थी) पर खड़ा हो गया। और वहीं, गिरकर मर गया। मंटो ने लिखा— "इधर कटीली तारों के पीछे हिंदुस्तान था, उधर पाकिस्तान... और बीच में, उस ज़मीन पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था।"
5. 'ठंडा गोश्त' और 'खोल दो': रूह कंपाने वाले सच
मंटो को 'बदनाम' करने में इन दो कहानियों का सबसे बड़ा हाथ था, लेकिन यही उनकी 'मास्टरपीस' भी हैं।
ठंडा गोश्त (Cold Meat)
दंगों के दौरान ईशर सिंह नाम का एक सिख लूटपाट और बलात्कार करने के इरादे से एक मुस्लिम घर में घुसता है। वह एक लड़की को कंधे पर उठाकर ले जाता है। लेकिन जब वह उसके साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करता है, तो उसे अहसास होता है कि लड़की मर चुकी है—वह एक 'ठंडी लाश' है। यह सदमा ईशर सिंह को हमेशा के लिए नामर्द (Impotent) बना देता है।
खोल दो (Open It)
यह कहानी रूह कंपा देती है। एक पिता (सिराजुद्दीन) अपनी खोई हुई बेटी (सकीना) को ढूंढ रहा है। रजाकार (वॉलंटियर्स) उसे ढूंढ लाते हैं लेकिन उसके साथ रेप करते हैं और उसे अधमरी हालत में अस्पताल छोड़ जाते हैं।
डॉक्टर जब बेहोश सकीना से कहता है— "खिड़की खोल दो", तो 'खोल दो' शब्द सुनते ही अचेत सकीना अपने हाथ नीचे ले जाती है और सलवार का नाड़ा खोल देती है। उसे लगता है कि फिर से कोई उसके साथ ज़बरदस्ती करने आया है। पिता यह देखकर खुशी से चिल्लाता है— "मेरी बेटी ज़िंदा है!" लेकिन डॉक्टर पसीने से तर-बतर हो जाता है।
6. मंटो का आखिरी खत खुदा के नाम
पाकिस्तान जाने के बाद मंटो आर्थिक तंगी और डिप्रेशन का शिकार हो गए। उन्हें बॉम्बे की बहुत याद आती थी। गम भुलाने के लिए उन्होंने सस्ती शराब पीनी शुरू कर दी।
18 जनवरी 1955 को, सिर्फ 42 साल की उम्र में लिवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) से उनका निधन हो गया।
मरने से पहले मंटो ने अपनी कब्र के लिए एक कुतबा (Epitaph) लिखा था, जो उनके अहंकार और प्रतिभा दोनों का सबूत है:
(हालांकि, विवाद से बचने के लिए उनके परिवार ने यह पत्थर उनकी कब्र पर नहीं लगवाया, लेकिन यह पंक्तियाँ आज भी अमर हैं।)
मंटो को पढ़ना आग से खेलने जैसा है। वो आपको जलाएंगे नहीं, लेकिन आपके अंदर की जमी हुई बर्फ को पिघला देंगे। आज के दौर में जब हम 'Freedom of Speech' की बात करते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि एक आदमी ने सच बोलने की कीमत अपनी जान देकर चुकाई थी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
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