क्रिया (Kriya) - Verb in Hindi Grammar
हिन्दी व्याकरण में क्रिया एक अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व है जो वाक्य में कार्य, घटना या अवस्था का संकेत देता है। बिना क्रिया के कोई भी वाक्य पूर्ण नहीं होता। यह न केवल विद्यार्थियों के लिए बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों, शिक्षकों और भाषा प्रेमियों के लिए भी अत्यंत उपयोगी विषय है।
क्रिया का अध्ययन करते समय हमें यह समझना आवश्यक है कि यह केवल एक शब्द या पद नहीं है, बल्कि यह वाक्य की आत्मा है। जिस प्रकार शरीर में प्राण के बिना जीवन संभव नहीं, उसी प्रकार वाक्य में क्रिया के बिना अर्थ की अभिव्यक्ति असंभव है।
क्रिया की परिभाषा (Kriya ki Paribhasha)
पारंपरिक परिभाषा
हिन्दी व्याकरण के प्राचीन और आधुनिक विद्वानों ने क्रिया की परिभाषा को विभिन्न दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किया है।
सामान्य परिभाषा: जिस शब्द से किसी काम का करना या होना प्रकट हो, उसे क्रिया कहते हैं।
विस्तृत परिभाषा: वे शब्द जो किसी व्यक्ति, वस्तु या जीव के कार्य (Action), स्थिति (State) या घटना (Event) के बारे में जानकारी देते हैं, क्रिया कहलाते हैं।
भाषाविज्ञान की दृष्टि से :
आधुनिक भाषाविज्ञान के अनुसार, क्रिया भाषा का वह घटक है जो कर्ता के कार्य, भाव या स्थिति को अभिव्यक्त करता है और वाक्य में काल, लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार परिवर्तित होता है। यह एक विकारी शब्द है, अर्थात् इसके रूप में परिवर्तन होता रहता है।
क्रिया के मुख्य लक्षण और विशेषताएँ
क्रिया को पहचानने और समझने के लिए इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:1. विकारी शब्द
क्रिया एक विकारी शब्द है। इसका अर्थ है कि इसके रूप में लिंग, वचन, काल, कारक और पुरुष के अनुसार परिवर्तन होता है।
उदाहरण:
- राम खाता है। (पुल्लिंग, एकवचन, वर्तमान काल)
- सीता खाती है। (स्त्रीलिंग, एकवचन, वर्तमान काल)
- बच्चे खाते हैं। (बहुवचन, वर्तमान काल)
- मोहन खा रहा था। (भूतकाल)
2. वाक्य का अनिवार्य अंग
प्रत्येक वाक्य में क्रिया अवश्य होती है। बिना क्रिया के वाक्य पूर्ण नहीं होता। कभी-कभी क्रिया अप्रत्यक्ष रूप में भी रह सकती है।
उदाहरण:
- बच्चा सो रहा है। (स्पष्ट क्रिया)
- बहुत अच्छा। (अप्रत्यक्ष क्रिया - पूर्ण रूप: बहुत अच्छा हुआ/किया)
3. धातु से निर्मित
क्रिया का निर्माण धातु से होता है। धातु क्रिया का मूल रूप है।
उदाहरण:
- धातु: पढ़, लिख, खा, पी, चल, दौड़
- क्रिया: पढ़ना, लिखना, खाना, पीना, चलना, दौड़ना
सामान्यतः धातु में "ना" प्रत्यय जोड़कर क्रिया का सामान्य रूप बनता है।
4. काल का बोध
क्रिया से यह ज्ञात होता है कि कार्य वर्तमान में हो रहा है, भूतकाल में हो चुका है या भविष्यकाल में होगा।
उदाहरण:
- मैं पढ़ता हूँ। (वर्तमान काल)
- मैंने पढ़ा। (भूतकाल)
- मैं पढ़ूँगा। (भविष्यकाल)
धातु (Dhatu) - क्रिया का मूल रूप
क्रिया के मूल अंश या मूल रूप को धातु कहते हैं। धातु वह आधार है जिससे क्रिया के विभिन्न रूप बनते हैं।धातु मुख्यतः दो प्रकार की होती है:
1. मूल धातु (स्वतंत्र धातु)
वह धातु जो किसी दूसरे शब्द पर निर्भर नहीं होती और स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होती है।
उदाहरण: जा, खा, पढ़, चल, लिख, सो, बैठ, रो, हँस, दौड़
2. यौगिक धातु (व्युत्पन्न धातु)
वह धातु जो किसी मूल धातु में संज्ञा, विशेषण या प्रत्यय लगाकर बनायी जाती है।
उदाहरण: चलना से चला, पढ़ना से पढ़ा
यौगिक धातु चार प्रकार की होती है:
1. प्रेरणार्थक धातु (जैसे: लिखना - लिखाना - लिखवाना)
2. संयुक्त धातु (जैसे: रोना-धोना, उठना-बैठना)
3. नाम धातु (जैसे: बात - बतियाना, अपना - अपनाना)
4. अनुकरणात्मक क्रिया (जैसे: खटखट - खटखटाना)
क्रिया के प्रकार (Kriya ke Prakar)
हिन्दी व्याकरण में क्रिया के भेद मुख्यतः दो आधारों पर किए जाते हैं:
I. कर्म के आधार पर क्रिया के भेद
कर्म के आधार पर क्रिया के दो मुख्य भेद होते हैं:
1. सकर्मक क्रिया (Transitive Verb)
2. अकर्मक क्रिया (Intransitive Verb)
II. प्रयोग/संरचना के आधार पर क्रिया के भेद
प्रयोग और संरचना के आधार पर क्रिया के निम्नलिखित मुख्य भेद होते हैं:
1. संयुक्त क्रिया
2. प्रेरणार्थक क्रिया
3. नामधातु क्रिया
4. पूर्वकालिक क्रिया
5. सहायक क्रिया
आइए अब प्रत्येक भेद को विस्तार से समझें।
कर्म के आधार पर क्रिया के भेद
1. सकर्मक क्रिया (Sakarmak Kriya)
परिभाषा : जिस क्रिया का प्रभाव या फल कर्ता पर न पड़कर कर्म पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जिन क्रियाओं में कर्म (Object) की आवश्यकता होती है, वे सकर्मक क्रियाएँ होती हैं।
पहचान: वाक्य में क्रिया के साथ "क्या" या "किसको" लगाकर प्रश्न करने पर यदि उत्तर मिलता है तो वह सकर्मक क्रिया है।
उदाहरण
वाक्य: राम सेब खाता है।
विश्लेषण:
- कर्ता: राम
- क्रिया: खाता है
- कर्म: सेब
- प्रश्न: राम क्या खाता है?
- उत्तर: सेब (कर्म)
अन्य उदाहरण:
- मोहन पुस्तक पढ़ता है। (कर्म: पुस्तक)
- मीरा फल लाती है। (कर्म: फल)
- सुरेश मिठाई खाता है। (कर्म: मिठाई)
- शिक्षक बच्चों को पढ़ाते हैं। (कर्म: बच्चों को)
सकर्मक क्रिया के भेद
सकर्मक क्रिया के दो उपभेद होते हैं:(क) एककर्मक क्रिया (Ekkarmak Kriya)
जिस क्रिया में केवल एक ही कर्म होता है, उसे एककर्मक क्रिया कहते हैं।
उदाहरण:
- प्रिया खाना खा रही है। (कर्म: खाना)
- विजय सेब खाता है। (कर्म: सेब)
- माँ खाना बना रही है। (कर्म: खाना)
(ख) द्विकर्मक क्रिया (Dvikarmak Kriya)
जिस क्रिया में दो कर्म होते हैं, उसे द्विकर्मक क्रिया कहते हैं। इनमें एक मुख्य कर्म (गौण कर्म - निर्जीव) और दूसरा गौण कर्म (मुख्य कर्म - सजीव) होता है।
उदाहरण:
- माँ ने बच्चों को पैसे दिए।
- पहला कर्म (सजीव): बच्चों को
- दूसरा कर्म (निर्जीव): पैसे
- शिक्षक ने विद्यार्थी को पुस्तक दी।
- पहला कर्म: विद्यार्थी को
- दूसरा कर्म: पुस्तक
- राम लक्ष्मण को गणित सिखाता है।
- राजा ने ब्राह्मण को दान दिया।
सकर्मक क्रियाओं के सामान्य उदाहरण
सुनना, बोलना, लिखना, पढ़ना, खाना, पीना, देखना, बनाना, धोना, सीखना, खिलाना, पिलाना, लाना, देना, लेना
2. अकर्मक क्रिया (Akarmak Kriya)
परिभाषा : जिस क्रिया का प्रभाव या फल कर्ता पर ही पड़ता है और जिसमें कर्म की आवश्यकता नहीं होती, उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं।पहचान: वाक्य में "क्या" या "किसको" लगाकर प्रश्न करने पर यदि उत्तर नहीं मिलता है, लेकिन "कौन" लगाकर उत्तर मिलता है, तो वह अकर्मक क्रिया है।
उदाहरण
वाक्य: बच्चा सो रहा है।
विश्लेषण:
- कर्ता: बच्चा
- क्रिया: सो रहा है
- प्रश्न: बच्चा क्या सो रहा है? (उत्तर नहीं मिलता)
- प्रश्न: कौन सो रहा है?
- उत्तर: बच्चा (कर्ता)
अन्य उदाहरण:
- राकेश रोता है।
- बस चलती है।
- उसैन बोल्ट दौड़ता है।
- रीता पढ़ रही है।
- तुम लोग गाते हो।
- पक्षी उड़ रहे हैं।
- कुत्ता दौड़ रहा है।
अकर्मक क्रियाओं के सामान्य उदाहरण
लजाना, होना, सोना, बैठना, हँसना, जागना, मरना, कूदना, रोना, उड़ना, तैरना, चलना, दौड़ना
सकर्मक और अकर्मक में अंतर
प्रयोग/संरचना के आधार पर क्रिया के भेद
1.संयुक्त क्रिया (Sanyukt Kriya)
परिभाषा : जब दो या दो से अधिक भिन्न-भिन्न अर्थ वाली क्रियाएँ आपस में मिलकर एक पूर्ण क्रिया बनाती हैं, तो उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं।
संयुक्त क्रिया का निर्माण धातु से बने हुए शब्दों (कृदंत) के आगे सहायक या सहकारी क्रियाएं जोड़ देने से होता है।
संरचना
मुख्य क्रिया + सहायक क्रिया = संयुक्त क्रिया
इसमें पहली क्रिया मुख्य क्रिया होती है और दूसरी सहायक क्रिया होती है।
उदाहरण
- लड़की गिर पड़ी। (गिरना + पड़ना)
- माँ ने बेटे को समझाना चाहा। (समझाना + चाहना)
- गाड़ी चली गई। (चलना + जाना)
- मैं यह काम कर सकती हूँ। (करना + सकना)
- रमेश चाय पी रहा है। (पीना + रहना)
- पिताजी ने भोजन कर लिया है। (करना + लेना)
- वे स्टेडियम पहुँच चुके होंगे। (पहुँचना + चुकना)
- मोहन आ चुका है। (आना + चुकना)
2. प्रेरणार्थक क्रिया (Preranarthak Kriya)
परिभाषा: जिस क्रिया से यह ज्ञात हो कि कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी अन्य को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, उसे प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं।
विशेषताएँ
प्रेरणार्थक क्रिया में दो कर्ता होते हैं:
1. प्रेरक कर्ता - जो प्रेरणा देता है
2. प्रेरित कर्ता - जो प्रेरणा लेकर कार्य करता है
प्रेरणार्थक क्रिया के दो रूप
हिन्दी में प्रेरणार्थक क्रियाओं के दो रूप होते हैं:
1. प्रथम प्रेरणार्थक - मूल धातु में 'आ'/'ना' प्रत्यय लगाकर
2. द्वितीय प्रेरणार्थक - मूल धातु में 'वा'/'वाना' प्रत्यय लगाकर
तालिका: प्रेरणार्थक क्रियाओं के रूप
उदाहरण
- माँ बच्चे को सुलाती है।
- प्रेरक कर्ता: माँ
- प्रेरित कर्ता: बच्चा
- प्रेरणार्थक क्रिया: सुलाना
- श्याम राधा से पत्र लिखवाता है।
- मोहन मुझसे किताब लिखाता है।
- मैंने उसे हँसाया।
- मैंने नौकर से काम करवाया।
3. नामधातु क्रिया (Namadhatu Kriya)
परिभाषा: जो क्रियाएँ संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण शब्दों में प्रत्यय लगाकर बनाई जाती हैं, उन्हें नामधातु क्रिया कहते हैं।नामधातु क्रिया की रचना
नामधातु क्रियाएँ चार प्रकार के शब्दों से बनती हैं:
(क) संज्ञा से
(ख) सर्वनाम से
(ग) विशेषण से
(घ) अनुकरणात्मक शब्दों से
उदाहरण
- ओजस्व से मिलकर मैं घंटों बतियाता रहा।
- तुम्हें दूसरों को नहीं लजाना चाहिए।
- दूध गर्मा रहा है।
4. पूर्वकालिक क्रिया (Poorvakalik Kriya)
परिभाषा: जब कर्ता एक क्रिया को समाप्त कर तुरंत दूसरी क्रिया में प्रवृत्त होता है, तब पहली क्रिया पूर्वकालिक क्रिया कहलाती है।मुख्य क्रिया से पहले जो क्रिया संपन्न होती है, वह पूर्वकालिक क्रिया होती है।
निर्माण :
पूर्वकालिक क्रिया मूल धातु में 'कर' या 'करके' लगाकर बनाई जाती है।
उदाहरण
- श्याम भोजन करके सो गया।
- पूर्वकालिक क्रिया: करके
- मुख्य क्रिया: सो गया
- पुजारी ने नहाकर पूजा की।
- पूर्वकालिक क्रिया: नहाकर
- मुख्य क्रिया: पूजा की
- राखी ने घर पहुँचकर फोन किया।
- बच्चा रोकर सो गया।
- मैंने अभी सोकर उठा हूँ।
- चोर सामान चुराकर भाग गया।
- आयुष ने भागकर बस पकड़ी।
5. सहायक क्रिया (Sahayak Kriya)
परिभाषा: जो क्रिया मुख्य क्रिया के साथ मिलकर वाक्य के अर्थ को स्पष्ट और पूर्ण करने में सहायता करती है, उसे सहायक क्रिया कहते हैं।विशेषताएँ
सहायक क्रिया अकेले पूर्ण अर्थ नहीं देती, बल्कि मुख्य क्रिया की सहायता करती है और काल, भाव आदि को स्पष्ट करती है।
उदाहरण
- मैं बाजार जाता हूँ।
- मुख्य क्रिया: जाता
- सहायक क्रिया: हूँ
- सीता पढ़ रही है।
- मुख्य क्रिया: पढ़
- सहायक क्रिया: रही है
- वह अपने घर चला गया।
- रमेश चाय पी रहा है। (पी = मुख्य, रहा है = सहायक)
क्रिया के अन्य महत्वपूर्ण भेद
1. अपूर्ण क्रिया (Apoorn Kriya)
जो क्रियाएँ अपने अर्थ को पूर्ण करने में असमर्थ रहती हैं और जिन्हें पूर्णता के लिए संज्ञा या विशेषण की आवश्यकता होती है, उन्हें अपूर्ण क्रिया कहते हैं।
उदाहरण:
- सोना पीला होता है। (होता है - अपूर्ण क्रिया)
- मैं तुझे बुद्धिमान समझता हूँ। (समझता हूँ - अपूर्ण सकर्मक क्रिया)
2. सजातीय क्रिया (Sajatiya Kriya)
जब क्रिया और कर्म की धातु एक ही हो, तो उसे सजातीय क्रिया कहते हैं।
उदाहरण:
- विमला हँसी हँसती है। (हँसना धातु से हँसी और हँसती दोनों)
- अनिल दौड़ दौड़ता है।
3. मुख्य क्रिया (Mukhya Kriya)
कर्ता या कर्म के मुख्य कार्यों को व्यक्त करने वाली क्रिया मुख्य क्रिया कहलाती है।
उदाहरण:
- राधा दूध लाई। (लाई = मुख्य क्रिया)
- मोहन ने दुकान खोली। (खोली = मुख्य क्रिया)
4. रंजक क्रिया
जो क्रियाएँ मुख्य क्रिया में रंग या भाव भरती हैं।
क्रिया की पहचान करने के नियम
विद्यार्थियों और परीक्षार्थियों के लिए वाक्य में क्रिया को पहचानना अत्यंत आवश्यक है। निम्नलिखित नियमों से क्रिया की पहचान आसानी से की जा सकती है:
जिस शब्द से किसी कार्य के होने या करने का बोध हो, वह क्रिया है।
उदाहरण: लड़का दौड़ रहा है। (दौड़ना - कार्य)
वाक्य में "क्या" या "किसको" लगाकर प्रश्न करें:
- यदि उत्तर मिले = सकर्मक क्रिया
- यदि उत्तर न मिले = अकर्मक क्रिया
उदाहरण:
- राम सेब खाता है। → राम क्या खाता है? → सेब (सकर्मक)
- सीता सोती है। → सीता क्या सोती है? → कोई उत्तर नहीं (अकर्मक)
प्रत्येक क्रिया में एक मूल धातु होती है। धातु + ना = क्रिया का सामान्य रूप।
क्रिया लिंग, वचन, काल के अनुसार बदलती है।
उदाहरण:
- लड़का खाता है। (पुल्लिंग, एकवचन)
- लड़की खाती है। (स्त्रीलिंग, एकवचन)
प्रत्येक पूर्ण वाक्य में क्रिया अवश्य होती है।
क्रिया का महत्व (Kriya ka Mahatva)
हिन्दी व्याकरण में क्रिया का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है:1. वाक्य रचना में महत्व
क्रिया के बिना कोई भी वाक्य पूर्ण नहीं होता। यह वाक्य की आत्मा है।
2. अर्थ की स्पष्टता
क्रिया से ही वाक्य का सही अर्थ स्पष्ट होता है। यह बताती है कि कौन-सा कार्य हो रहा है।
3. समय का बोध
क्रिया से काल (वर्तमान, भूत, भविष्य) का ज्ञान होता है।
4. भाषा की जीवंतता
क्रियाएँ भाषा को गतिशील और जीवंत बनाती हैं।
5. व्याकरणिक संरचना
क्रिया लिंग, वचन, पुरुष आदि से संबंधित होने के कारण वाक्य को व्याकरणिक रूप से सही बनाती है।
क्रिया और कर्ता में संबंध
प्रत्येक क्रिया का एक कर्ता होता है जो उस क्रिया को करता है।उदाहरण:
- राम पुस्तक पढ़ता है।
- कर्ता: राम (जो पढ़ने का कार्य कर रहा है)
- क्रिया: पढ़ता है
- कर्म: पुस्तक
क्रिया और संज्ञा में अंतर
कभी-कभी विद्यार्थी क्रिया और संज्ञा में भ्रमित हो जाते हैं। इसे समझना आवश्यक है:निष्कर्ष (Nishkarsh)
हिन्दी व्याकरण में क्रिया एक अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत तत्व है। यह न केवल वाक्य को पूर्ण करती है, बल्कि भाषा को जीवंतता और गतिशीलता प्रदान करती है। क्रिया के बिना किसी भी भाव या विचार की अभिव्यक्ति संभव नहीं है।
प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक, भाषाविदों और व्याकरणाचार्यों ने क्रिया के विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन किया है। महर्षि पाणिनि से लेकर आचार्य किशोरीदास वाजपेयी तक, सभी ने क्रिया की व्याख्या और वर्गीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
विद्यार्थियों के लिए क्रिया का सम्यक् ज्ञान अत्यावश्यक है। यह न केवल परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि शुद्ध और प्रभावी भाषा के प्रयोग के लिए भी आवश्यक है। कर्म के आधार पर सकर्मक और अकर्मक क्रिया, तथा प्रयोग के आधार पर संयुक्त, प्रेरणार्थक, नामधातु, पूर्वकालिक और सहायक क्रिया - ये सभी भेद हमें भाषा की संरचना को गहराई से समझने में सहायता करते हैं।
क्रिया का अध्ययन केवल व्याकरणिक नियमों को रटने का विषय नहीं है, बल्कि यह भाषा के प्रवाह और अभिव्यक्ति को समझने का माध्यम है। जब हम क्रिया को सही रूप में प्रयोग करते हैं, तो हमारी भाषा सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली बनती है।
आशा है कि यह विस्तृत व्याख्या विद्यार्थियों, शिक्षकों और भाषा प्रेमियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। निरंतर अभ्यास और उदाहरणों के माध्यम से क्रिया का ज्ञान और अधिक सुदृढ़ होगा।
याद रखें: क्रिया भाषा की प्राणवायु है। इसे समझिए, इसका अभ्यास कीजिए और शुद्ध हिन्दी के प्रयोग में निपुण बनिए।
यह विषय न केवल व्याकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि समग्र भाषा विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
जय हिन्दी! जय भारत!
